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संडे स्तंभ : सोने की धरती मुंबई

विमल मिश्र
मुंबई

कभी भायखला के डॉ. भाऊ दाजी लाड म्यूजियम जाएं तो उसकी गैलरियों में सजे चित्रों, कलाकृतियों व मॉडल्स पर नजर जरूर डालें, जिन्होंने मुंबई के कई कालखंडों को मॉडेल्स और चित्रावलियों के साथ सहेजा हुआ है। ‘सोने की धरती’ की तलाश में प्रवासी समुदायों, उनके काम-धंधों और उनके खेल, संगीत, नृत्य व शिकार जैसे तफरीह के साधनों, ग्राम्य जीवन व टाउन प्लानिंग का नजारा देखकर आंखें झपकना भूल जाती हैं। म्यूजियम के इस खंड में आप रोमन काल के दलदली द्वीपों से १९वीं सदी के महानगर तक-मुंबई के उद्भव को इस काल की नक्शों, लीथोग्राफ, वॉटर कलर्स, फोटोग्राफ के जरिए साक्षात देख सकते हैं। साथ में समुद्र का मुक्त नजारा, सुंदर बंगले, वृक्षदार सड़कों और शानदार हेरिटेज इमारतों के नमूने भी।
६६ प्रतिशत पानी से घिरी मुंबई का जो स्वरूप, आकार और विस्तार आज दिखता है, वह चार सदियों से इसी तरह लगातार हो रहे भौगोलिक परिवर्तनों की देन है। इसमें मुख्य है लगातार होनेवाली समुद्र की पटाई (रिक्लेमेशन)। नरीमन पॉइंट, मरीन ड्राइव, बेलार्ड इस्टेट, कफ परेड, ससून डॉक, ओवल मैदान और बैकबे जैसे पुराने इलाके ही नहीं, कलानगर, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स और लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स जैसे मुंबई के नए इलाके भी इस रिक्लेमेशन का ही नतीजा हैं।
गेटवे आए थे इंग्लैंड के सम्राट व सम्राज्ञी
आज का गेटवे ऑफ इंडिया अपोलो बंदर पर लगभग उसी जगह है, जहां बॉम्बे वैâसल (मुंबई का पुराना किला) का अपोलो गेट हुआ करता था। इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी १९११ के दिल्ली दरबार के सिलसिले में इसी स्थान पर भारत आए थे और रवाना भी यहीं से हुए थे। अपोलो बंदर पहले विलिंगटन पियर कहलाता था। मछुआरों की कच्ची जेटी से ब्रिटिश वायसरायों, गवर्नरों और गणमान्य व्यक्तियों का लैंडिंग स्पॉट बनने मे इसे सदियां लग गर्इं। आज यह मुंबई का सबसे लोकप्रिय पर्यटकस्थल है। देश की आजादी के बाद ब्रिटिश फौजों ने २८ फरवरी, १९४८ को समुद्र के रास्ते यहीं से भारत से वापसी का कूच शुरू किया।
चौपाटी था लकड़ी बंदर और जुहू जुवेम
१८६५ में मलबार हिल की पहाड़ियां काट समुद्र पाटकर गिरगांव की जो जमीन निकली, उस तक समुद्र की लहरों के पहुंचने का अंतिम स्थान ‘चौ पाटी’ (चार जलमार्ग) कहलाने लगा। १.२ किलोमीटर लंबा गिरगांव चौपाटी उन दिनों ‘लकड़ी बंदर’ के नाम से जाना जाता था। यहां मछली बाजार था, मछलियों के हड्डी के चूर्ण से खाद बनाई जाती थी और मछलियों के साथ चूना व मसाले पानी के जहाज से विदेश रवाना किए जाते थे। यहां हिंदुओं का श्मशान भी था। आज यही गिरगांव चौपाटी जुहू के साथ मुंबई का सबसे मशहूर समुद्र तट है।
१९वीं सदी तक जुहू साल्सेट के पश्चिमी तट से कुछ दूर नन्हा-सा एक द्वीप होता था- समुद्र तल से महज एक या दो मीटर ऊपर उठी हुई लंबी-सी संकीर्ण रेत की छोटी-सी पट्टी। इसे ‘जुवेम’ पुकारते थे। ज्वार के उतार पर ही इस तक पहुंचना संभव होता। पुर्तगाली इसे ‘जुवेम’ पुकारते थे। उत्तरी छोर पर जुहू गांव था, जिसमें भंडारी, आगरी और कुनबी रहते थे। दक्षिणी छोर पर बांद्रा द्वीप के सामने मछुआरों का कोलीवाड़ा था, जहां ईस्ट इंडियन ईसाइयों की संख्या अधिक थी।
१८९० के दशक में टाटा घराने के संस्थापक जमशेदजी टाटा ने जुहू में जमीन खरीदी और एक बंगला बनाया। आज जिसे जुहू तारा कहते हैं, वहां जमशेदजी की १,२०० एकड़ भूमि विकसित करने की योजना थी। यहां पहुंच के लिए वे पहले से मौजूद माहिम कॉजवे को सांताक्रुज तक विस्तारित करना चाहते थे। १९०४ में उनके निधन के बाद यह योजना छोड़ दी गई। धीरे-धीरे बड़े-बड़े होटलों रिसॉर्ट्स व क्लबों का निर्माण शुरू हुआ। बंगलों की तो बस्ती ही बस गई। इनमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन सरीखे फिल्म स्टार्स के बंगले भी थे। १९७० के दशक में भक्तिवेदांत स्वामी (श्रील प्रभुपाद) ने इस्कॉन मंदिर बनाकर यहां से ‘हरे कृष्ण आंदोलन’ की शुरुआत की। आज पश्चिम में अरब सागर, उत्तर में वर्सोवा, पूर्व में विले पार्ले व अंधेरी और दक्षिण में सांताक्रुज से घिरा हुआ जुहू शहर के सबसे पॉश, महंगे और समृद्ध क्षेत्रों में से एक है। कितनी ही फिल्मों में आपने इसका दीदार किया होगा।
समुद्र पाटकर बना ससून डॉक और भाऊचा धक्का कचरे से
रेलवे की शुरुआत के साथ अपनी कारोबारी संभावनाओं की वजह से मुंबई बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभरने लगा था। यहां गोदियां बनाने की योजना बनी तो रिक्लेमेशन फायदे का सौदा बन गया। १८७५-१८८० के बीच मोदी बंदर, मोदी बे रिक्लेमेशन और ओल्ड बेलार्ड पियर और १८९३ में अपोलो पियर के निर्माण हुए। तीन हेक्टेयर क्षेत्र में पैâला ६४५ फुट लंबा और २९२ फुट चौड़ा विशाल ससून डॉक भी ८ जून, १८७५ को समुद्र पाटकर बनाया गया है।
‘भाऊचा धक्का’ नाम पड़ा १८४१ में मुंबई का पहला वेट फेरी वार्फ को बनवाने वाले, भाऊ लक्ष्मण हरि चंदारजी अजिंक्य (१७८९-१८५८) के नाम पर, जिन्हें लोग स्नेह से भाऊ (बड़े भाई) के नाम से पुकारते थे। १८३५ से पहले मुंबई में यात्रियों या साजो-सामान के लिए घाट नहीं हुआ करते थे। ऐसे में सरकार ने मुंबई का पूर्वी किनारा निजी तौर पर लीज के लिए खोला, तो इसका सबसे पहले फायदा उठाया ‘भाऊ’ ने। चिंचबंदर से महात्मा फुले मार्वेâट तक एक जेटी बनाने की एवज में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार से नौकाओं पर माल चढ़ाने-उतारने का ठेका ले लिया और यह पूरी जगह कचरा फेक-फेककर पाट डाली। कर्नाक बंदर (१८३९ से १८४१ के दौरान मुंबई के गवर्नर सर जेम्स रिवेट कर्नाक के नाम पर) और क्लेयर बंदर (१८३१ से १८३५ के दौरान मुंबई के गवर्नर सर अर्ल ऑफ क्लेतर के नाम पर) को अस्तित्व में लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। इन्हें ‘भाऊचा धक्का’ के नाम से जाना जाने लगा।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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