-एसआईआर पर फैसले पर योगेंद्र यादव ने जताई चिंता
-सुप्रीम कोर्ट को बता डाला ‘उपभोक्ता फोरम’
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर को लेकर दिए हालिया फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर अदालत की टिप्पणी के बाद आशंका जताई जा रही है कि लाखों नागरिकों के वोटिंग अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं। चुनाव सुधारों के लिए लंबे समय से सक्रिय योगेंद्र यादव ने इस फैसले को लोकतंत्र के लिए बड़ा झटका बताते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पर सवाल उठा दिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को ‘उपभोक्ता फोरम’ तक बता डाला।
बता दें कि एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा पैâसला सुनाते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद इस मामले में विपक्ष ने कड़ी प्रतिक्रियाएं दी हैं। मुख्य याचिकाकर्ता रहे योगेंद्र यादव ने एक बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का आरोप लगाया है। साथ ही इस फैसले की तुलना १९७६ के कुख्यात `एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ केस से की है। योगेंद्र यादव ने अपने बयान की शुरुआत में ही साफ कर दिया कि वह फैसला सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं गए थे। उन्होंने कहा, `इस मामले में एक वादी होने के नाते और कोर्ट के सामने अपनी बात रखने का सम्मान पाने वाले व्यक्ति के तौर पर मुझे आज आशान्वित, चिंतित या कम से कम उत्सुक होना चाहिए था, लेकिन मैं नहीं था। इस केस का फैसला बहुत पहले ही हो चुका था। हम तो बस इसकी फाइनल कॉपी और उसमें लिखी बारीकियों का इंतजार कर रहे थे।’
`फ्री एंड फेयर इलेक्शन जरूरी’
एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। एसआईआर को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते, फ्री एंड फेयर इलेक्शन जरूरी है। चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, अपनी शक्तियों के बाहर नहीं।
उच्चतम न्यायालय ने खड़े किए कई सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्प्रâेंस कर कहा कि कोर्ट ने संवैधानिक वैधता को मान तो लिया है लेकिन उच्चतम न्यायालय ने जितने जवाब दिए हैं, उतने ही सवाल भी खड़े कर दिए हैं। नागरिकता के मुद्दे पर स्पष्ट किया गया है कि इस विषय में अंतिम संस्था चुनाव आयोग नहीं है। इसमें नागरिकता एक्ट के अंदर निर्णायक संस्था सक्षम प्राधिकारी जैसे- गृह मंत्रालय आदि हैं।
