अजय भट्टाचार्य
पिछले महीने के आखिरी शुक्रवार को खबर आई कि राजस्थान में खींवसर के विधायक रेवंतराम डांगा ने फसल बीमा का भुगतान पाने की खातिर पिताजी का नाम बदल दिया। जमाबंदी नकल में विधायकजी के पिता का नाम रामचंद्र बताया गया और विधायक उनके दत्तक पुत्र बताए गए। जबकि फसल बीमा पॉलिसी के दस्तावेजों में पिता का नाम बिंजाराम बताया गया। खबर वायरल हुई तो बीमा भुगतान रोक दिया गया। अभी तक विधायकजी के पिता का नाम बदलने की चर्चा थी कि रविवार को एक जनसभा में उप मुख्यमंत्री राजकुमारी दियाकुमारी ने ‘विधायक जी’ का ही नाम बदल दिया। आसंबोधन में उन्हें खेतराम डांगा कह दिया। मजे की बात यह है कि उप मुख्यमंत्री के पार्श्व में बैठे विधायकजी ने तुरंत जनता का अभिवादन भी कर दिया!
अभिशप्त विकास
डबल इंजन सरकार वाले प्रदेशों में विकास धरती फाड़कर अपने होने का सबूत दे रहा है। उत्तर प्रदेश में पीलीभीत के थाना गजरौला क्षेत्र के शिवनगर गांव में केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद चौपाल लगाकर जनसमस्याएं सुनने गए थे। जनसमस्याएं सुनने से पहले वह अपनी और अपनी सरकार द्वारा उत्पन समस्या (विकास) के खुद ही शिकार हो गए। मंत्री जी की गाड़ी कीचड़ में ऐसी फंसी कि निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। फिर इस कार को कीचड़ के मुख से मोक्ष दिलाने के लिए ट्रैक्टर से गुहार लगाई गई। गर्र-गर्र की आवाज करते हुए ट्रैक्टर महाराज प्रकट हुए और अपने पिछवाड़े रस्सी से मंत्रीजी की कार को बंधवाकर कीचड़ से बाहर निकाला। इस बीच बेइज्जती का घूट पीकर मंत्रीजी पैदल ही निकल पड़े और लोगों की समस्याओं को सुना।
जेटली के बहाने
केंद्र के सत्तारुढ़ पार्टी की शिकायत है कि उसके दिवंगत नेता व आधी रात को देश को गब्बर सिंह टैक्स से परिचय करानेवाले अरुण जेटली के बारे में कोई ऐसी बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उसकी पुष्टि करने के लिए अब वह इस नश्वर संसार में नहीं हैं। नैतिकता भी यही कहती है कि संसार छोड़ चुके प्राणी को विवादों में नहीं खींचना चाहिए। क्योंकि वह व्यक्ति अपना पक्ष रखने में असमर्थ होता है। पिछले १०-१२ सालों से नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से सत्ता का मुखिया, उसके चेले-चपाटे उन्हें जिंदा मानकर सवाल पर सवाल पूछ रहे हैं। वैसे भी ये लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अड़ंगा डालकर मुखिया को काम ही नहीं करने दे रहे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
