कविता श्रीवास्तव
महाराष्ट्र के पालघर जिले में देर से स्कूल आने पर एक शिक्षिका ने एक छात्रा को कठोर दंड दे दिया। खबर है कि उससे बस्ता कंधे पर उठाए हुए सौ बार उठक-बैठक करवाया गया। सात दिनों बाद छात्रा की मौत हो गई। एक अन्य घटना में दिल्ली के राजेंद्र प्लेस मेट्रो स्टेशन से कूदकर एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। उसके सुसाइड नोट में शिक्षकों की प्रताड़ना को कारण बताया गया है। छात्र के पिता ने आरोप लगाया कि उनका बेटा कई महीनों से परेशान था, उसके साथ बुरा व्यवहार किया जा रहा था। स्कूल में उसे हर छोटी बात पर डांटा जाता है। शिक्षक उसे मानसिक रूप से चोट पहुंचाते थे। पिता ने कई बार मौखिक शिकायत की लेकिन वे नहीं माने। इधर महाराष्ट्र के पालघर में एक अन्य घटना में एक स्कूल के विद्यार्थियों को एक किलोमीटर दूर नहर से पानी लाने भेजा जाता था। शिकायत है कि देर से लौटने वाले बच्चों को शिक्षक ने खूब थप्पड़ जमाए। पिटाई के डर से अन्य बच्चे पास के जंगल में छिप गए। अभिभावकों ने बच्चों से काम कराने और दुर्व्यवहार किए जाने की शिकायत की है। शिक्षा विभाग व अन्य इसकी जांच कर रहे हैं। ऐसी घटनाएं स्कूलों के प्रबंधन और व्यवस्था के अलावा कुछ शिक्षकों की मानसिकता की ओर भी संकेत करती हैं। शिक्षकों का पेशा अत्यंत ही सम्मानजनक और आदर्श माना जाता है। स्कूलों में अनुशासन आवश्यक है। किंतु शिक्षा और अनुशासन के नाम पर कई बार शिक्षकों की ओर से मनमानी और दुर्व्यवहार किए जाने की शिकायतें भी आती है। विद्यार्थियों की गलतियों पर उन्हें सजा देने के नाम पर कई बार शिक्षक अमानवीय कृत्य कर जाते हैं। विद्यार्थियों को सजा देने वाले शिक्षकों की मानसिकता कई बातों पर निर्भर करती है। इसमें नियमों के उल्लंघन पर तत्काल प्रतिक्रिया, भय पैदा करके अनुशासन बनाने की सोच या बच्चों के सामाजिक-भावनात्मक व्यवहार को समझने में असमर्थता भी शामिल है। कुछ मामलों में, शिक्षक व्यक्तिगत कुंठा या मनोवैज्ञानिक कारणों से भी ऐसी मानसिकता वाले हो सकते हैं। इससे बच्चों में भय और तनाव का माहौल बनता है। यह बात शिक्षा में छात्रों की रुचि कम कर सकती है। हालांकि, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में शारीरिक और मानसिक दंड जैसी बात नहीं है। सजा छात्रों के विकास के लिए हानिकारक है। कई देशों में इसे कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया है। हमारे यहां ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं। इस संबंध में शिक्षा विभाग और अधिकारियों के साथ-साथ विद्यालय प्रबंधन को भी सचेत होने की आवश्यकता है। शिक्षकों के चयन में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उनकी मानसिकता और उनकी सामाजिक सोच का भी ख्याल रखना चाहिए। समय-समय पर शिक्षकों की काउंसलिंग भी होनी चाहिए। शिक्षक विद्यार्थियों की रुचि व उनका उत्साह बढ़ाएं। विद्यार्थियों के भीतर से भय निकालें और मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखें। क्रोधित और क्रूर स्वभाव न रखें। यह विद्यार्थियों, शिक्षा संस्थानों और समाज के लिए जरूरी है।
