सैयद सलमान, मुंबई
उत्तर प्रदेश में ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर से शुरू हुआ विवाद कुछ ही दिनों में उस बिंदु तक पहुंच गया, जहां पूरा मुस्लिम समाज खुद को निशाने पर पाता देख रहा है। बरेली में मौलाना तौकीर रजा की गिरफ्तारी हुई, उनके साथ कई और लोगों को भी जेल भेज दिया गया। विरोध करनेवाले सड़कों पर पुलिस की लाठियों से पिटे और उसके बाद बुलडोजर कार्रवाई ने कई परिवारों की पीढ़ियों की मेहनत को मलबे में बदल दिया। दुकानों की इमारतें, मकानों की दीवारें और सम्मान की नींव, सब कुछ एक झटके में ढहा दिया गया। सवाल यह नहीं है कि कोई नारा या पोस्टर किस हद तक सही या गलत था, बल्कि असल मुद्दा यह है कि क्या इस आधार पर पूरे परिवार और उनकी रोजी-रोटी को तबाह कर देना न्याय कहलाएगा? सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि बिना कानूनी प्रक्रिया के की गई बुलडोजर कार्रवाई अवैध है। इसके बावजूद लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं। मकान और दुकान को गिराने से पहले अदालत की अनुमति, जांच या सुनवाई की कोई प्रक्रिया पूरी नहीं होती। यह तरीका कानून से ज्यादा सत्ता के अहंकार प्रदर्शन जैसा लगता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाषा भी इस पूरे परिदृश्य में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। ‘अरे तुरे’ जैसी हड़काऊ शैली, मौलाना कहकर कटाक्ष और पीढ़ियों तक सबक सिखाने की धमकी, यह सब उस संवैधानिक गरिमा के खिलाफ जाता है, जिसकी उम्मीद एक मुख्यमंत्री से की जाती है। किसी सरकार की सबसे बड़ी पहचान उसका न्याय और सामाजिक संतुलन होता है, लेकिन यहां ताकत और डर दिखाना ही राजनीति का साधन बन गया है। जब शीर्ष पद से ही धमकी भरी भाषा सुनाई दे तो शासन-प्रशासन भी उसी अहंकारी तेवर में काम करता है। वह इस बात को मान कर चलता है कि सूबे का मुखिया न्याय व्यवस्था से ऊपर है।
लेकिन सवाल केवल सरकार तक सीमित नहीं है। मुस्लिम समाज को भी अपनी रणनीति पर सोचने की जरूरत है। जब यह साफ है कि सड़कों पर प्रदर्शन आज की राजनीतिक परिस्थितियों में सीधा टकराव माना जाता है और उसका नतीजा लाठियां, जेल और बुलडोजर ही बनते हैं तो यह रास्ता बार-बार क्यों अपनाया जाता है? गुस्से और आस्था का इजहार हो सकता है कि जरूरी हो, लेकिन अदालत और संविधान से बाहर निकलकर की गई लड़ाई हर बार नुकसान ही पहुंचाती है। न्याय का रास्ता लंबा और कठिन जरूर है, लेकिन वही स्थाई समाधान देता है।सबसे गंभीर चिंता यह है कि बुलडोजर का इस्तेमाल चुनिंदा तौर पर हो रहा है। अगर हिंसा या अपराध किसी दूसरे समुदाय से जुड़ा हो तो वहां अक्सर यही बुलडोजर खामोश रहता है। बहराइच में जब दुकानों को आग के हवाले किया गया, वहां दोषियों पर ऐसी कार्रवाई नहीं हुई। फतेहपुर की घटनाओं में भी यही सख्ती नहीं दिखाई गई। बहराइच में मुसलमानों के दुकान-मकान पंâूकने वालों पर ऐसी कार्रवाई नहीं हुई। इसका सीधा असर यह होता है कि कानून पर से भरोसा उठने लगता है और न्याय एकतरफा दिखने लगता है। इस पूरे माहौल में विपक्ष की चुप्पी भी उतनी ही हताश करनेवाली है। सरकार बुलडोजर और कठोर भाषा से अपनी ताकत दिखा रही है, लेकिन विपक्ष जनता के पक्ष में खड़ा नहीं हो रहा। उसे शायद वोटों के ध्रुवीकरण का डर सता रहा है। नतीजा यह हुआ है कि मुसलमान अकेला पड़ गया है, न्याय से वंचित और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से महरूम। लोकतंत्र में यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है।
जरूरत है कि सत्ता और समाज दोनों अपने-अपने दायित्व समझें। सरकार को चाहिए कि वह धमकी और दमन की भाषा छोड़कर संविधान और कानून के दायरे में काम करे। बुलडोजर न्याय का साधन नहीं है, यह केवल अविश्वास और डर को और गहरा करता है। मुस्लिम समाज को भी यही समझना होगा कि अधिकारों और सम्मान की असली लड़ाई अदालतों और कानून की चौखट पर लड़ी जाती है, सड़कों पर टकराकर नहीं। बरेली की घटना इस बात का सबूत है कि जब कानून ताकत की चमक के नीचे दब जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है। मुसलमानों के लिए यह वक्त संयम और संवाद का है। मुसलमानों की नई पीढ़ी को शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। उलेमा की जिम्मेदारी है कि उन्हें सही मार्ग दिखाएं। जो भी लोग प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार हुए उनके परिवार की आर्थिक हालत अगर ठीक न हुई तो सलाखें उनका मुकद्दर बन जाएंगी। परिवार तितर-बितर हो जाएंगे। आर्थिक मार की चपेट में आने से परिवार तबाह हो जाएगा। बुलडोजर सिर्फ र्इंट-पत्थर नहीं गिराता, वह भरोसा भी तोड़ देता है और अगर भरोसा टूटता गया तो नुकसान केवल एक समाज का नहीं, पूरे देश का होगा। राजनीति की चालें बदल जाएंगी, लेकिन टूटे विश्वास का जख्म पीढ़ियों तक बना रहेगा।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
