मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : स्टेटस बना रहे भगवान का!

तरकश : स्टेटस बना रहे भगवान का!

धनुर्धर

भगवान जी ने भविष्य को अज्ञात रखा है तो कुछ सोच-समझकर ही रखा है। उन्हें मालूम था कि इंसान को वे बना तो रहे हैं, लेकिन बन जाने के बाद उसके खुराफाती दिमाग को कंट्रोल में रखना मुश्किल होगा। बात-बेबात वह उन पर ही सवाल उठाएगा। उनके किए-अनकिए को उन्हीं के लॉजिक से घेरने का प्रयास करेगा कि प्रभो, आप तो सर्वशक्तिमान हैं, करुणानिधान हैं, फिर आपने ऐसा किया तो क्यों किया और ऐसा नहीं किया तो क्यों नहीं किया?
भगवान क्या हुए
हो सकता है, उसकी कुछ बातें सही भी हों, लेकिन इस तरह अगर उसके हर सवाल का जवाब देने लगें और अपनी छोटी-छोटी गलतियों पर उसके सामने खेद प्रकट करने लगें, उससे माफी मांगने लगें, तो फिर भगवान क्या हुए। सवाल उनके सर्वशक्तिमान स्टेटस का था। जाहिर है, स्टेटस पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता। इंसान को हर हाल में यह मालूम होना चाहिए कि वह महज एक इंसान है और सामने जो है, उसे भगवान कहते हैं। तुम उसके सामने रोते-गिड़गिड़ाते, विनतियां करते तो अच्छे लगते हो, उससे जवाबतलब करते हुए नहीं।
लिमिटेड छूट
सो, भगवान ने यह अधिकार उसे नहीं दिया कि वह सवाल करे और भगवान जी जवाब लेकर हाजिर हो जाएं। यह छूट जरूर दी कि वह सवाल जितने चाहे करे, उन पर कोई रोक नहीं है। बस भगवान जी से जवाब पाने की उम्मीद न करे। भगवान जी उसके सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे। यह भी नहीं जताएंगे कि उसके सवाल वे सुन भी रहे हैं या नहीं। इससे भगवान और इंसान, दोनों का अपना-अपना स्टेटस बना रहता है। दूसरे शब्दों में, इंसान अपनी औकात में रहता है।
सुरक्षा की दूसरी परत
यह व्यवस्था थी तो अच्छी, लेकिन पर्याप्त नहीं थी। किसी को अपनी औकात में रखने के लिए उसकी बातों को अनसुना करना ही काफी नहीं होता। ऐसा करने पर एक सीमा के बाद आपका अटेंशन पाने के लिए वह आपको बुरा-भला कहते हुए सारी हदें पार कर सकता है। यहां से फिर स्टेटस प्रभावित होने का खतरा पैदा हो जाता है। इसलिए भगवान जी ने सुरक्षा की दूसरी परत तैयार की। इसके तहत उन्होंने इंसान के भविष्य को गोपनीय बना दिया। लाख छटपटा ले, इंसान अपना भविष्य नहीं पता कर सकता।
कुंजी आ गई हाथ में
अब उसकी कुंजी भगवान जी के हाथ में आ गई, हमेशा के लिए। वर्तमान चाहे जितना भी बुरा हो, उसे अपने अज्ञात भविष्य का डर हमेशा सताता रहता है। उसे लगता है कि भविष्य कहीं इससे भी बुरा न हो। सो, वह भगवान जी की कृपा अपने सिर पर हमेशा बनाए रखने की आकांक्षा से खुद को मुक्त नहीं कर पाता। जाहिर है, अतीत और वर्तमान के अपने कष्टों के लिए भगवान जी को कोसते हुए भी उसे इस बात का ख्याल रहता है कि भगवान जी को एक सीमा से ज्यादा नाराज न किया जाए। बुरा-भला कहें भी तो उन पर अपना हक जताते हुए कुछ इस तरह से कहें कि उनका बड़प्पन ही स्थापित होता हो। इमोशनल ब्लैकमेलिंग तक चल जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ न कह दें कि भगवान जी आपसे नाता ही तोड़ लें।
इहलोकी समीकरण
भगवान और भक्त के बीच रिश्तों का यह समीकरण आप इहलोक में भी देख सकते हैं। जो इहलौकिक भगवान हैं, भले ही वे पांच-पांच साल के लिए चुने जाते हों, भक्तों से अपने संबंधों के स्टेटस को वे भी बिगड़ने नहीं देते। हालांकि इनका काम परलोक वाले भगवान से ज्यादा मुश्किल है। एक तो हर चुनाव के समय इन्हें भक्तों को ही अपना भगवान घोषित करना पड़ता है। चाहे वह कितना ही ऊपरी और दिखावे वाला हो, लेकिन संबंधों का स्टेटस उलटने का खतरा कितना बड़ा होता है, आप समझ सकते हैं। बहुत होशियारी से चुनाव होते ही भक्तों को उनकी असली औकात दिखानी होती है और कुछ इस अदा से दिखानी होती है कि अगले चुनाव के समय होने वाले दिखावे पर वे कोई सवाल न खड़ा कर सकें।
अतीत का डर
दूसरी बात यह कि भविष्य का झांसा तो वे दे सकते हैं, लेकिन भविष्य को अज्ञात बनाए रखने जैसी ताकत उनके पास नहीं है। वह तो परलोक वाले भगवान जी का खेल है, जिसके आगे इहलोक के सारे भक्त-भगवान, सब एक जैसे लाचार हैं। इन इहलोकी भगवानों को भी अपने भविष्य की चिंता कम नहीं सताती। तभी तो वे चुनाव के वक्त भक्तों को भगवान बनाने की मजबूरी पालते हैं। लेकिन फिर सवाल उठता है कि वर्तमान के कष्टों से त्रस्त भक्तों को काबू में कैसे रखें। इसके लिए इन भगवानों ने अतीत को अपना हथियार बनाया है। वे भक्त का भविष्य नहीं संवार सकते, वर्तमान भी बेहतर नहीं बना सकते, सो अतीत का डर दिखाकर काम चलाते हैं।
धन्यवाद, सिर्फ धन्यवाद
चाहे किसी खास राज्य का जंगल राज हो या किसी खास शासन का आपातकाल, वे इनका ऐसा भीषण चित्र खींचते हैं कि वर्तमान के सारे कष्ट उसके सामने बौने लगने लगें। अकबकाया हुआ भक्त बेचारा अपने मौजूदा दौर की परेशानियों का वास्ता देना भूल, भगवान को इस बात का धन्यवाद देता रह जाता है कि आपने उस भीषण अतीत से हमें मुक्त किया। वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों पर भले ही इसका कोई असर न पड़े, भगवान और भक्त दोनों का अपना-अपना स्टेटस जस का तस बना रह जाता है। यह क्या कम बड़ी उपलब्धि है लोकतंत्र के लिए!
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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