गर्मी आई गांव में, तपने लगा जहान।
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
सूरज बरसे आग-सा, झुलसे खेत-खलिहान,
प्यासे पंछी ढूंढ़ते, छांव भरा वरदान।
मिट्टी की ठंडी छुअन, देती नव अवधान—
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
फ्रिजों वाली ठंड में, छिपे कई नुकसान,
गला जले, तन काँपे, बिगड़े पाचन-प्राण।
मटके का पानी मगर, रखता तन में जान—
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
सौंधी-सौंधी गंध से, महके सारा द्वार,
बचपन वाली याद का, खुल जाए भंडार।
माँ के हाथों-सा लगे, इसका मीठा पान—
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
प्लास्टिक वाली बोतलों में, छिपा विषधार,
धरती रोती देख कर, बढ़ता यह व्यापार।
मिट्टी का घड़ा बचाए, प्रकृति की पहचान—
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
कुम्हारों की आस है, चले सदा ही चाक,
माटी से ही जुड़ सके, जीवन की हर डोर।
गर्मी में मटका बने, जन-जन की मुस्कान—
मटके वाला जल बना, जैसे अमृत-दान।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
