संतोषी रावत
सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने के अधिकार को संविधान के भाग-३ के तहत एक मौलिक अधिकार मानकर देश के करोड़ों पैदल यात्रियों को एक बड़ी कानूनी ताकत दी है। सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर द्वारा संसद में उठाए गए मुद्दों पर कोर्ट की यह मुहर नीति निर्माताओं को जगाने के लिए काफी है। लेकिन इस ऐतिहासिक पैâसले के बाद सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही उठता है कि अधिकार तो मिल गया, पर क्या हमारे शहरों में पैदल चलने के लिए फुटपाथ बचे भी हैं?’
पैदल यात्रियों की लाचारी
आज देश के किसी भी बड़े या छोटे शहर, राजधानी या कस्बे की सड़कों पर निकलें, एक चीज जो पैदल चलने वालों के नसीब में नहीं दिखती, वह है साफ और सुरक्षित फुटपाथ। कागजों और सरकारी फाइलों में दर्ज फुटपाथ असलियत में ‘अतिक्रमण की जागीर’ बन चुके हैं।
इस बेकाबू अतिक्रमण का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।
जान का जोखिम: फुटपाथ न होने के कारण बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगजनों को मजबूरन मुख्य सड़क पर गाड़ियों के बीच चलना पड़ता है, जिससे हर वक्त हादसों का डर बना रहता है।
असुरक्षित बुनियादी ढांचा: जो थोड़े-बहुत फुटपाथ बचे भी हैं, वे इतने ऊंचे-नीचे या टूटे हुए हैं कि उन पर चलना किसी चुनौती से कम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का पैâसला केवल अदालती कमरों तक सीमित न रहे, इसके लिए सरकारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी। बुनियादी ढांचे का विकास केवल ‘गाड़ियों की रफ्तार’ बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि ‘इंसानों की सुरक्षा’ के लिए होना चाहिए। जब तक प्रशासन फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए सख्त कदम नहीं उठाएगा, तब तक पैदल चलने का यह मौलिक अधिकार महज एक खूबसूरत सपना ही बना रहेगा।
अतिक्रमण का चक्रव्यूह
फुटपाथों पर अतिक्रमण का संकट बहुआयामी है। कहीं दुकानदारों ने अपनी दुकानों का सामान फुटपाथों तक पैâला रखा है, तो कहीं रेहड़ी-पटरी और अवैध खोमचे वालों का इस पर कब्जा है। हद तो तब हो जाती है जब लोग अपने वाहनों की पार्विंâग के लिए फुटपाथ का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, बिजली के ट्रांसफॉर्मर, कचरे के डिब्बे और सरकारी निर्माण कार्य भी बची-खुची कसर पूरी कर देते हैं।
