शीतल अवस्थी
राजा दशरथ के महल में पुत्र प्राप्ति के लिए पूरे बारह दिन तक चला था पुत्रकामेष्ठी यज्ञ और इस दौरान दशरथ ऋषि श्रृंगी के तप, उनके ज्ञान और शक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी इकलौती पुत्री शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि से करने का निर्णय ले लिया और तब श्रृंगी बन गए दशरथ के दामाद। माना जाता है कि श्रृंगवेरपुर धाम के मंदिर में श्रृंगी ऋषि और देवी शांता निवास करते हैं। यहीं पास में है वो जगह, जो राम सीता के वनवास का पहला पड़ाव भी माना जाता है। इसका नाम है रामचौरा घाट।
रामचौरा घाट पर राम ने राजसी ठाट-बाट का परित्याग कर वनवासी का रूप धारण किया था। त्रेतायुग में ये जगह निषादराज की राजधानी हुआ करती थी। निषादराज मछुआरों और नाविकों के राजा थे। यहीं भगवान राम ने केवट से गंगा पार कराने की मांग की थी।
केवट अपने पूर्वजन्म में कभी कछुआ हुआ करता था। एक बार की बात है उसने मोक्ष के लिए शेष शैया पर शयन कर रहे भगवान विष्णु के अंगूठे का स्पर्श करने का प्रयास किया था। उसके बाद एक युग से भी ज्यादा वक्त तक कई बार जन्म लेकर उसने भगवान की तपस्या की और अंत में त्रेता में केवट के रूप में विष्णु के अवतार भगवान राम के हाथों मोक्ष पाने का प्रसंग बना। राम केवट के मर्म को समझ रहे थे, वो केवट की बात मानने को राजी हो गए। अग्निदेव कहते हैं, `वशिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायण का वर्णन करूंगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकि जी को सुनाया था। इसका पाठ भोग और मोक्ष-दोनों को देने वाला है।’
देवर्षि नारद कहते हैं, `वाल्मीकि जी! भगवान विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र हैं मरीचि। मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य और सूर्य से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। उसके बाद वैवस्वत मनु से इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुई। इक्ष्वाकु के वंश में ककुत्स्थ नामक राजा हुए। ककुत्स्थ के रघु, रघु के अज और अज के पुत्र दशरथ हुए। उन राजा दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिए साक्षात भगवान विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए। उनकी बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से श्री रामचंद्र जी का प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ। महर्षि ऋष्यश्रृंग ने उन तीनों रानियों को यज्ञ सिद्ध चरू दिए थे, जिन्हें खाने से इन चारों कुमारों का आविर्भाव हुआ। श्रीराम आदि सभी भाई अपने पिता के ही समान पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वामित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालने वाले निशाचरों का नाश करने के लिए राजा दशरथ से प्रार्थना की कि आप अपने पुत्र श्री राम को मेरे साथ भेज दें। तब राजा ने मुनि के साथ श्री राम और लक्ष्मण को भेज दिया। श्री रामचंद्रजी ने वहां जाकर मुनि से अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा पायी और ताड़का नाम वाली निशाचरी का वध किया, फिर उन बलवान वीर ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञ विघातक राक्षस सुबाहु को दल-बल सहित मार डाला। इसके बाद वे कुछ काल तक मुनि के सिद्धाश्रम में ही रहे। तत्पश्चात विश्वामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मण सहित श्री राम मिथिला नरेश का धनुष-यज्ञ देखने के लिए गए।
