तौसीफ कुरैशी
‘सत्ता, सियासत और सन्नाटे की कहानी’ उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी एक नाम गूंजता था कभी पिताजी का टिकट कटवाकर अपना टिकट ले आए थे नरेश अग्रवाल को कौन नहीं जानता। हरदोई की गलियों से लेकर लखनऊ के सत्ता गलियारों तक उनका अंदाज अलग था। वो नेता कम, बयानवीर ज्यादा थे। शब्द उनके हथियार थे और विवाद उनका कवच। समाजवाद राजनीति के इस खिलाड़ी ने हर सत्ता के साथ तालमेल बैठाने की कला साध ली थी। सरकार किसी की भी रही हो, उनका जलवा बरकरार रहा अब खामोशी की चादर ओढ़े हुए हैं क्यों? लेकिन राजनीति में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब २०१८ में वही नरेश अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। जो नेता कल तक नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले करता था, वही अचानक सत्ता के साथ खड़ा दिखा। यह सिर्फ दल बदल नहीं था, यह एक चरित्र परिवर्तन की शुरुआत थी। और यहीं से कहानी दिलचस्प नहीं, रहस्यमय हो जाती है, क्योंकि उसके बाद नरेश अग्रवाल ‘खबर’ नहीं रहे। यह सिर्फ एक उदाहरण नहीं है। बिहार के साबिर अली को याद कीजिए। कभी जेडीयू के आक्रामक चेहरे थे। टीवी डिबेट्स में मोदी विरोध उनका स्थायी भाव था। लेकिन जैसे ही उन्होंने भाजपा की ओर कदम बढ़ाया, २४ घंटे के भीतर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर भी राजनीति में उनका पुनर्वास हुआ चुपचाप, बिना शोर के। पद मिला, पर पहचान खो गई। इसी सिलसिले में एक और नाम उभरता है शहजाद अली। शाहीन बाग के आंदोलन में जो चेहरा मुखर था, सीएए के खिलाफ जो आवाज बुलंद थी, वही जब भाजपा में शामिल हुआ तो उसका तेवर बदल गया। जो कल तक ‘क्रांति’ की बात करता था, आज ‘समाधान’ की भाषा बोलने लगा। लेकिन सवाल वही है क्या वह अब भी खबर है? या सिर्फ सत्ता का एक शांत पुर्जा? मुंबई हमलों को लेकर विवादित बयान देनेवाले कृपाशंकर सिंह हों या कांग्रेस के बड़े चेहरे जैसे अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा इन सबका राजनीतिक डीएनए अलग था। लेकिन भाजपा में आने के बाद एक समानता दिखती है सन्नाटा। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी और अर्जुन सिंह जैसे नेताओं ने जरूर अपनी आक्रामकता बरकरार रखी, लेकिन वो भी अब ‘लाइन’ में हैं। अपनी भाषा में नहीं, पार्टी की भाषा में बोलते हैं। यह पैटर्न क्या बताता है?
भाजपा कोई साधारण राजनीतिक दल नहीं है यहां दिखाने को एक अनुशासित ढांचा बनाया गया है, जहां व्यक्ति के कोई मायने नहीं, विचार और संगठन सर्वोपरि है। यहां ‘प्रâी स्टाइल’ राजनीति की जगह नहीं है। जो नेता बाहर रहते हुए अपनी पहचान ‘बयानों’ से बनाते हैं, उन्हें यहां ‘संयम’ का ताला लगा दिया जाता है- सीखना भी पड़ता है।
‘सत्ता आदमी को नहीं बदलती, उसे उजागर करती है।’ चाहे कितना ही बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो भाजपा में शामिल होने के बाद चेन की सांसें लेता बस ईडी, सीबीआई और आईटी जैसी एजेंसियां अब उन्हें ट्रेस नहीं कर रही होती हैं इन नेताओं का जो रूप सामने आता है वह शायद उनका असली रूप है या नहीं होता है? जहां सत्ता के साथ समझौता है और व्यक्तिगत आक्रामकता का त्याग। अब बात करते हैं नए नाम राघव चड्ढा की। वे भाजपा में प्रवेश कर गए हैं, अब क्या होगा? इतिहास कहता है या तो वे भी ‘मौन साध लेंगे’ या फिर खुद को पूरी तरह नए रंग में ढाल लेंगे।
यहां एक दिलचस्प रूपक समझना जरूरी है। भाजपा को अक्सर ‘गंगा’ कहा जाता है, जहां सब पवित्र हो जाते हैं, लेकिन सियासत की हकीकत इससे अलग है। यहां नेता नहीं, ‘नैरेटिव’ चलता है और वह भी झूठ का, नफरत का और जो इस नैरेटिव में फिट नहीं बैठता, वह या तो बदल जाता है या किनारे हो जाता है। अंतत: सवाल यही है कि क्या ये नेता सच में बदलते हैं या सिर्फ परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं? शायद जवाब दोनों के बीच कहीं है। लेकिन इतना तय है कि अपने जमीर को बेचकर भाजपा में शामिल होना खबर बन सकता है, मगर वहां टिके रहकर सियासत करना उनके बस में नहीं होता है। वहां सारा किरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तय करता है और वह उसको आगे बढ़ाता है, जो उसकी विचारधारा के लिए मुफीद होता बाकी को बर्फ में लगा दिया जाता है और जो नेता अपने-अपने दलों में हक-हकूकों की बातें करते हैं और भाजपा में शामिल होकर या समझौता कर अपनी सियासी मौत के हलफनामे पर हस्ताक्षर कर देते है।
सत्यमेव जयते
