डॉ. मंगेश आमले
जीडीपी, सकल घरेलू उत्पाद किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे लोकप्रिय पैमाना है। जब भी जीडीपी के आंकड़े आते हैं तो आंकड़ों की बाजीगरी और ढोल-नगाड़ों का एक नया दौर शुरू हो जाता है। लेकिन क्या ७.५ प्रतिशत या ७.७ प्रतिशत की चमचमाती विकास दर जमीनी हकीकत का सही आईना है? सच यह है कि जीडीपी का खेल जितना ऊपर से सुहावना दिखता है, उसकी अंदरूनी हकीकत उतनी ही पेचीदा और डरावनी है।
जीडीपी के इस खेल का सबसे बड़ा विरोधाभास ‘के-शेप्ड’ रिकवरी और बढ़ती असमानता में छिपा है। आंकड़े बताते हैं कि कॉर्पोरेट मुनाफा बढ़ रहा है, शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाइयों को छू रहा है और महंगे ब्रांड्स तथा लग्जरी गाड़ियों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। यह ‘ख्’ का ऊपर जाता हुआ हिस्सा है। लेकिन दूसरी तरफ, आम आदमी की थाली से दाल-सब्जी गायब हो रही है, ग्रामीण इलाकों में मजदूरी ठहर गई है और बेरोजगारी का संकट बरकरार है,यह ‘के’ का नीचे गिरता हुआ हिस्सा है। जब मुट्ठी भर अमीर बहुत तेजी से अमीर होते हैं तो जीडीपी का गणित तो सुधर जाता है, लेकिन आम जनता की परचेजिंग पावर दम तोड़ने लगती है।
दूसरा बड़ा संकट कृषि और रोजगार का है। भारत की लगभग आधी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। लेकिन जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी लगातार घटकर २० प्रतिशत से नीचे आ गई है और इसकी विकास दर ३ प्रतिशत के आस-पास सुस्त पड़ी है। इसके विपरीत, सर्विस सेक्टर का जीडीपी में योगदान ५४ प्रतिशत से अधिक हो चुका है। सेवा क्षेत्र बेशक पैसा कमा कर दे रहा है, लेकिन यह देश की विशाल अकुशल और अर्ध-कुशल आबादी को रोजगार देने में नाकाम रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, जो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा कर सकता था, उसकी हिस्सेदारी सालों से एक ही जगह थमी हुई है। बिना रोजगार के बढ़नेवाली जीडीपी केवल कागजी विकास है।
इसके अलावा, वर्तमान में वैश्विक परिस्थितियां जैसे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, युद्ध और कमजोर मानसून के अनुमान इस आर्थिक चमक को कभी भी धुंधला कर सकते हैं। जब तक विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, तब तक जीडीपी की ऊंची दरें केवल एक भ्रम हैं। हकीकत तब बदलेगी जब आर्थिक नीतियों का ध्यान केवल ‘आंकड़ों के खेल’ पर नहीं, बल्कि वास्तविक रोजगार, कृषि सुधार और आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को मजबूत करने पर होगा।
