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रात के अंधेरे में रोते हुए एक डेढ़ साल के मासूम की चीख अचानक घुट जाती है। वह अपनी मां की छाती की महक ढूंढ रहा है, लेकिन उसे घेरकर खड़े हैं ठंडे, सफेद दस्ताने पहने कुछ हाथ। यह किसी डरावनी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के बरेली और हापुड़ के अस्पतालों, मेलों और गलियों का वह खौफनाक सच है, जिसने इंसानियत को आईसीयू में धकेल दिया है। जिसे हम ‘धरती का भगवान’ कहते थे। वह डॉक्टर अब कसाई बन चुका है, जो अस्पताल जिंदगी बचाने के लिए थे वे अब मासूमों की खरीद-फरोख्त के चमचमाते ‘कॉरपोरेट हेडक्वार्टर’ में तब्दील हो चुके हैं। यह सड़क छाप चोरों का धंधा नहीं, बल्कि ममता की लाश पर खड़ा अरबों का एक संगठित ‘सप्लाई चेन साम्राज्य’ है।
इस घिनौने कॉरपोरेट मॉडल के पीछे छिपे आंकड़े रूह कंपा देनेवाले हैं। वैâलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन्स फाउंडेशन और गेम्स २र्४े७ की सिचुएशनल डेटा रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश बाल तस्करी के सबसे बड़े गढ़ बन चुके हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े गवाही देते हैं कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में ‘अपहरण’ का हिस्सा सबसे बड़ा (लगभग ४० प्रतिशत) है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) के मुताबिक, दुनियाभर में मानव तस्करी का यह घिनौना बाजार सालाना १५० बिलियन डॉलर का मुनाफा कूट रहा है। इसी मुनाफे की मलाई चाटने के लिए यूपी में डॉक्टरों, नर्सों, आईवीएफ सेंटरों और दलालों का यह पूरा सिंडिकेट काम कर रहा है। बरेली में सामने आया गिरोह ५ से रु.१० लाख रुपए में एक बच्चे का सौदा करता था। हद तो यह है कि अविवाहित गर्भवती महिलाओं को पैसों का लालच देकर उनकी कोख को ‘मैन्युपैâक्चरिंग यूनिट’ की तरह इस्तेमाल किया गया। जन्म लेते ही बच्चे को मां से छीनकर अमीर निसंतान दंपतियों को बेच दिया गया, जो कानूनी गोद लेने की लंबी प्रक्रिया से बचकर ‘शॉर्टकट’ तलाश रहे थे।
वहीं दूसरी तरफ, हापुड़ में इस तस्करी का एक और डरावना चेहरा दिखा, जहां महज १०,००० रुपए से१२,००० रुपए में १५ किशोर लड़कों को खेतों और पैâक्ट्रियों में बंधुआ मजदूरी के लिए बेच दिया गया। आंकड़ों के अनुसार, बचाए गए बच्चों में ८० प्रतिशत पीड़ित १३ से १८ वर्ष के किशोर होते हैं। अनाथ बच्चे, प्रवासी मजदूर और झोपड़पट्टी के बेबस परिवार इस कॉरपोरेट मॉडल के लिए सबसे सस्ता ‘कच्चा माल’ हैं।
जब तक गोद लेने के कानून सरल नहीं होंगे और गरीबी की लाचारी खत्म नहीं होगी, तब तक उत्तर प्रदेश की एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की फाइलें ऐसे ही मासूमों के खून और चीखों से रंगती रहेंगी। यह मुनाफा नहीं, हमारे समाज के पूरी तरह सड़ जाने का प्रमाण है।
मासूमों का काला बाजार
बरेली से हापुड़ तक पैâले बाल तस्करी के नेटवर्क ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। कहीं नवजात बच्चों की लाखों में खरीद-फरोख्त हो रही है, तो कहीं किशोरों को बंधुआ मजदूरी के लिए बेचा जा रहा है। यह अपराध नहीं, समाज की संवेदनहीनता का भयावह चेहरा है।
