सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक और आर्थिक रूप से संपन्न राज्य है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। विकास योजनाओं, कृषि कर्ज माफी, सामाजिक योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में छात्रों को दिए जाने वाले अनुदान की राशि भी लंबित हो रही है। वित्त मंत्री व उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने तो यहां तक कह दिया है कि उन्होंने कहा कि इसमें छात्रों को नाराज नहीं होना चाहिए। दरअसल राज्य में कर्ज के बोझ से सरकार का सीना दब चुका है, जिससे खर्चे का अंबार देखकर वित्त मंत्री को पसीना आने लगा है।
एक कार्यक्रम में बोलते हुए अजीत पवार ने कहा कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के इन मौके पर छात्रों ने आंदोलन किया था। उन्हें आश्वस्त भी किया गया था, लेकिन बाद में सरकार ने तमाम घोषणाएं कर खुद का खर्च बढ़ा लिया है। ऐसे में सरकार की हालत आर्थिक रूप से कमजोर हो गई है। इसलिए अब इस छात्रों को अनुदान देना मुश्किल है।
बता दें कि वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र पर इस वक्त कुल कर्ज ९ लाख करोड़ रुपए से भी अधिक हो चुका है। कोरोना महामारी के बाद राजस्व घाटे के साथ खर्च बढ़ गया, जिससे कर्ज का स्तर और तेजी से बढ़ा।
बड़ी रकम ब्याज चुकाने में खर्च
हर साल राज्य के बजट में बड़ी रकम केवल ब्याज चुकाने में चली जाती है। किसानों की समस्याओं और आत्महत्याओं को देखते हुए बार-बार कर्जमाफी की घोषणा की जा रही है, लेकिन वह भी इस आर्थिक समस्या के चलते नहीं किया जा रहा है। राज्य में तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं के चलते जहां भारी खर्च हुआ, वहीं उद्योगों की सुस्ती, जीएसटी की हिस्सेदारी में देरी और कोरोना जैसी आपदाओं से राज्य की आय प्रभावित हुई।
