-डॉ. रवीन्द्र कुमार
-कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर
दि हिस्ट्री ऑफ एंग्लो-इंडियन्स एक ग्राफिक उपन्यास है। यह मूलतः एक ऐतिहासिक पुस्तक है। मैंने हाल ही में इसे पढ़ा। इस पुस्तक को कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर, दोनों एंग्लो-इंडियन लेखकों ने लिखा और चित्रित किया है। यह पुस्तक इतनी दिलचस्प है कि इसे शुरू करने के बाद बिना पूरी पढ़े आप इसे छोड़ नहीं सकते। यह पुस्तक अपनी कॉमिक्स-टाइप स्टोरीलाइन के कारण आपकी आँखों और मस्तिष्क, दोनों पर सहज प्रभाव डालती है।
इस पुस्तक ने मेरे अनेक ‘डाउट’ साफ करने में मदद की है। मैं अपनी अज्ञानता में सोचता था कि एंग्लो-इंडियन वे व्यक्ति होते हैं, जिनके माता-पिता, दादा या परदादा में से कोई एक ब्रिटिश रहा हो, लेकिन यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि उनके पूर्वज पुर्तगाली, फ्रांसीसी या डच भी हो सकते हैं। वे भी एंग्लो-इंडियन ही कहलाते हैं।
यह पुस्तक न केवल एंग्लो-इंडियनों के इतिहास और भूगोल का विवरण देती है, बल्कि उनके समाजशास्त्र और नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) का भी विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करती है। मुझे यकीन है कि यह पुस्तक स्वयं एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए भी अनेक दृष्टियों से शिक्षाप्रद सिद्ध होगी, विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए, जिसे अपने इतिहास, विरासत और आनुवंशिकता को जानने का एक सरल माध्यम प्राप्त होगा।
मैं लेखक-द्वय के कार्य से प्रभावित हूँ। हैरी मैक्ल्युर एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सम्मानित सेलिब्रिटी हैं। भारत में पारसियों के इतिहास तथा अन्य जातीय समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुत-सी पुस्तकें उपलब्ध हैं, लेकिन एंग्लो-इंडियनों पर प्रामाणिक सामग्री का अभाव है। विकास कुमार झा द्वारा लिखित मैक्लुस्कीगंज पर मैंने एक पुस्तक पढ़ी थी, जो हिन्दी में है। वह अब ‘भूतिया शहर’ मैक्लुस्कीगंज का एक प्रामाणिक विवरण मानी जाती है।
भारत के निर्माण में एंग्लो-इंडियनों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आप किसी भी ऐसे क्षेत्र का नाम नहीं ले सकते, जिसमें कोई न कोई एंग्लो-इंडियन चमकदार सितारे की तरह न चमका हो। चाहे वह भारतीय फिल्मों का क्षेत्र हो, राजनीति, शिक्षा, साहित्य या संगीत का। भारतीय रेलवे रोजगार के लिए उनकी पहली पसंद हुआ करती थी। रेलवे के पुराने कर्मचारियों के बीच एंग्लो-इंडियनों के अनेक किस्से मशहूर रहे हैं। उन्हें अपने काम, अपने रोजगार और अपनी जीवनशैली पर गर्व होता था। उनकी वफादारी और जीवनशैली दूसरों के लिए ईर्ष्या का विषय होती थी। 1947 तक आते-आते उनमें से अनेक परिवार ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड चले गए।
मैं सत्तर वर्ष का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ। मैंने भारतीय संसद में फ्रैंक एंथनी को थ्री-पीस सूट और उनकी पसंदीदा टाई में भाषण देते देखा है। मैं दिल्ली के फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल भी एक-दो बार गया हूँ। मैंने अपनी बेटियों के लिए इस स्कूल में प्रवेश दिलाने का असफल प्रयास किया था। स्कूल की लॉबी में फ्रैंक एंथनी एस्क्वायर का एक आदमकद तैलचित्र शोभा बढ़ाता है।
प्रथम दृष्टया यह पुस्तक 1150 रुपये की महंगी प्रतीत हो सकती है, लेकिन उत्कृष्ट गुणवत्ता वाला चमकदार कागज और सुंदर चित्र, जिनमें बारीक विवरण दिए गए हैं, इसकी कीमत को उचित ठहराते हैं। प्रकाशक एंग्लो-इंक बुक्स, चेन्नई, ऐसी कलात्मक और ऐतिहासिक महत्व की उत्कृष्ट कृति को प्रकाशित करने के लिए सराहना के पात्र हैं। कीथ बटलर और हैरी मैक्ल्युर ने संयुक्त रूप से इतिहास और विरासत प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज रचा है। अब यह सभी पुस्तक प्रेमियों तथा इतिहास और विरासत के संरक्षकों का कर्तव्य है कि वे इसे भावी पीढ़ियों के लिए संजोकर रखें।
