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अंदर की बात : घर का सपना या सरकारी खजाने का नया जरिया?

राजन पारकर

मुंबई में घर खरीदना पहले ही किसी तपस्या से कम नहीं था। अब चर्चा है कि संपत्ति पंजीकरण शुल्क भी बढ़ाया जा सकता है। सरकार कहती है कि राजस्व बढ़ाना जरूरी है। जनता पूछती है कि क्या हर बार खजाना भरने का ठेका सिर्फ करदाता और घर खरीदने वाले नागरिक ने ही लिया है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि शुल्क वृद्धि को लेकर कई विकल्पों पर विचार चल रहा है। कहीं केवल महंगे इलाकों पर बोझ डालने की बात है, तो कहीं सभी पर समान वृद्धि की चर्चा है। बिडंबना देखिए कि जिस शहर में आम आदमी जीवनभर ईएमआई भरता है, उसी शहर में घर खरीदने से पहले सरकार भी एक नई पर्ची थमा देती है। सरकार जनता को घर नहीं दे सकती, लेकिन घर खरीदने का बिल जरूर बढ़ा सकती है। राजनीति सत्ता के नए समीकरण खोज रही है। प्रशासन राजस्व बढ़ाने के नए रास्ते तलाश रहा है। बाजार महंगाई के नए रिकॉर्ड बना रहा है। लेकिन बंद कमरों में होने वाली इन बैठकों में आम आदमी की कुर्सी आज भी खाली है। क्योंकि सत्ता की हर नई चाल का हिसाब अंतत: जनता की जेब से ही वसूला जाता है।
सत्ता की सौदेबाजी, महंगाई की मार और जनता की जेब पर वार!
दिल्ली से मुंबई तक बंद कमरों में चल रही है राजनीति, जबकि आम आदमी महंगाई और नए आर्थिक बोझ के बीच पिसता जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण गढ़ने की कवायद तेज है। उधर महंगाई ने रसोई का बजट बिगाड़ दिया है और अब घर खरीदना भी और महंगा होने की आशंका जताई जा रही है। सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में रणनीति बन रही है, लेकिन जनता के हिस्से में आखिर कब राहत आएगी?
विलय का ‘वरमाला समारोह’ या सत्ता का नया गणित?
राजनीति में विचारधारा अब उतनी ही बची है, जितनी चुनावी भाषणों में सच्चाई! कल तक जो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे थे, आज वही सत्ता के बरामदे में साथ बैठने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। सूत्रों के अनुसार चर्चा है कि दोनों राष्ट्रवादी दलों के संभावित विलय की कहानी केवल संगठन की नहीं, बल्कि सत्ता की गिनती की कहानी है। कोई कह रहा है कि पहले विलय करो, फिर दरवाज़ा खुलेगा। कोई कह रहा है कि ऐसा कोई प्रस्ताव ही नहीं। मंत्री गिरीश महाजन ने साफ इनकार कर दिया, लेकिन राजनीति में इनकार अक्सर अगली स्वीकृति का ट्रेलर भी साबित हुआ है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि महाराष्ट्र में २०२९ की बिसात अभी से बिछाई जा रही है। कौन किसके साथ जाएगा, कौन किसे छोड़ेगा और किसकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी, यही असली गणित है। जनता पूछ रही है, क्या चुनाव विचारधारा पर लड़े जाते हैं या बाद में सत्ता की सुविधा के हिसाब से रिश्ते तय होते हैं?
अंडा भी हुआ ‘वीआईपी’, आम आदमी की थाली से प्रोटीन गायब!
महंगाई अब केवल पेट्रोल और सब्जियों तक सीमित नहीं रही। अब तो अंडा भी ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो किसी पांच सितारा होटल का मेहमान हो। सरकारें विकास के आंकड़े गिनाने में व्यस्त हैं, लेकिन आम आदमी यह गिन रहा है कि महीने में कितने अंडे खरीद पाएगा। कभी कहा जाता है कि गर्मी ने मुर्गियां मार दीं, कभी चारे की कीमत बढ़ गई, तो कभी अंतर्राष्ट्रीय हालात जिम्मेदार बताए जाते हैं। सवाल यह है कि हर संकट की कीमत आखिर केवल उपभोक्ता ही क्यों चुकाए? सूत्रों के अनुसार, पोल्ट्री उद्योग सरकार से राहत पैकेज और दीर्घकालिक नीति की उम्मीद लगाए बैठा है। लेकिन तब तक आम आदमी की रसोई में प्रोटीन की जगह महंगाई का स्वाद परोसा जा रहा है। ऐसा लगता है कि देश में अब अंडा खाने से पहले भी जेब का तापमान देखना पड़ेगा।

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