सरकार की नीतियों ने बढ़ाई आत्महत्याएं
सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति सरकार की लापरवाह कृषि नीतियों का कड़वा फल अब खुलकर सामने आ गया है। राज्य के २४.७३ लाख किसान, बैंकों के ३५ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज तले दबे हुए हैं, जबकि खेतों में बाढ़-सूखा, बाजार में गिरती फसल की कीमतें और घरों में बढ़ती भूख इन सबके बीच सरकार सिर्फ घोषणाओं का ढोल पीटती रही है। पिछले चार वर्षों में किसानों की आत्महत्या दर लगातार बढ़ी, खेती की लागत आसमान छूती रही और आय घटती गई। लेकिन महायुति सरकार की नीतियां किसानों को राहत देने के बजाय उनकी मुश्किलें और गहरी करती चली गईं। अब ३० जून से पहले ‘पूर्ण कर्जमाफी’ का शोर मचाकर सरकार नुकसान की भरपाई करने का दिखावा कर रही है।
उल्लेखनीय है कि राज्य के किसानों को सरकार ने वर्ष २०१७ में डेढ़ लाख और वर्ष २०१९ में दो लाख रुपए की कर्जमाफी दी थी। राशि की सीमा में कर्जमाफी दिए जाने के कारण कई किसान उन योजनाओं का लाभ नहीं उठा सके। वहीं आपदाओं और मौजूदा महायुति सरकार की गलत नीतियों के चलते किसान पूरी तरह से दिवालिया हो चुके हैं। आलम यह है कि बाढ़ और सूखा से जहां फसल बर्बाद हो गए, वहीं प्याज, सोयाबीन, अरहर, फलों-सब्जियों के दाम गिरे हैं। किसानों को गन्ने का एकमुश्त एफआरपी नहीं मिलता। ऐसी मुश्किलों के कारण किसानों के सामने परिवार के पालन-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। सहायता एवं पुनर्वास विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में रोजाना औसतन छह से सात किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इसमें नासिक, अमरावती, छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर विभाग में सबसे अधिक संख्या है। किसान नियमित रूप से कर्ज चुका सकें, बार-बार बैंकों का कर्ज बढ़ने का कारण क्या है, अब कर्जमाफी किस तरीके से की जा सकती है। इन सभी मुद्दों पर समिति का अध्ययन शुरू है, जिसे दिखावटी बताया जा रहा है। कहा गया है कि १० अप्रैल तक यह समिति राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी।
