शीतल अवस्थी
दुर्गा सप्तशती का यह मंत्र देवी को प्रत्येक प्राणी के हृदय में बुद्धि के रूप में स्थित बताते हुए उनसे स्वर्ग और अपवर्ग अर्थात मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना करता है। इसका वास्तविक संदेश सत्कर्म, विवेक और सांसारिक बंधनों से ऊपर उठने की प्रेरणा है।
सनातन परंपरा में मां दुर्गा को केवल शक्ति और सुरक्षा की देवी नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक और मुक्ति प्रदान करने वाली परमशक्ति भी माना गया है। देवी माहात्म्य अर्थात दुर्गा सप्तशती में देवी नारायणी की स्तुति करते हुए देवताओं ने उन्हें संसार के प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित बुद्धि और चेतना के रूप में प्रणाम किया है।
स्वर्ग और मुक्ति की कामना से यह मंत्र पढ़ा जाता है—
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
मंत्र का सरल अर्थ
हे देवी नारायणी! आप सभी मनुष्यों और प्राणियों के हृदय में बुद्धि के रूप में स्थित हैं। आप स्वर्ग और अपवर्ग अर्थात मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। आपको बार-बार नमस्कार है।
इस मंत्र में ‘बुद्धि’ का अर्थ केवल पढ़ाई अथवा स्मरणशक्ति नहीं है। यहां बुद्धि से आशय उस विवेक से है, जो मनुष्य को उचित और अनुचित, धर्म और अधर्म तथा स्थायी और अस्थायी के बीच अंतर समझाता है। धार्मिक दृष्टि से यही विवेक मनुष्य को सत्कर्म की ओर ले जाता है और अंततः मुक्ति का मार्ग खोलता है।
स्वर्ग और अपवर्ग का अंतर
मंत्र में देवी को ‘स्वर्गापवर्गदे’ कहा गया है। स्वर्ग को पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाला दिव्य सुख माना जाता है, लेकिन यह भी स्थायी नहीं बताया गया। पुण्य का फल समाप्त होने पर जीव को पुनः जन्म-मरण के चक्र में आना पड़ता है।
‘अपवर्ग’ का अर्थ मोक्ष अथवा इस जन्म-मरण के चक्र से स्थायी मुक्ति है। आध्यात्मिक परंपरा में मोक्ष को मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। इस प्रकार मंत्र में देवी से केवल सुख-सुविधा या स्वर्ग की नहीं, बल्कि परम शांति और आत्मिक स्वतंत्रता की प्रार्थना की गई है।
हृदय में बुद्धिरूप से विराजमान देवी
मंत्र का सबसे गहरा संदेश यह है कि देवी बाहर किसी मंदिर या प्रतिमा तक सीमित नहीं हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में बुद्धि, विवेक और सद्प्रेरणा के रूप में उपस्थित हैं। जब मनुष्य अन्याय के सामने सत्य का चुनाव करता है, क्रोध के स्थान पर क्षमा अपनाता है और स्वार्थ छोड़कर दूसरों की सहायता करता है, तब उसके भीतर स्थित देवी की शक्ति सक्रिय होती है।
इसलिए मंत्र-जप के साथ अपने विचारों और कर्मों को शुद्ध करना आवश्यक माना गया है। केवल शब्दों का उच्चारण करते हुए अधर्म, छल अथवा हिंसा का व्यवहार करना मंत्र के मूल भाव के विपरीत है।
मंत्र-जप की सरल विधि
प्रातःकाल या संध्याकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। शांत और पवित्र स्थान पर मां दुर्गा का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें। दीपक और धूप जलाकर देवी को लाल पुष्प अर्पित करें। इसके बाद माता का ध्यान करते हुए मंत्र का 11, 21 अथवा 108 बार जप करें।
जप के लिए रुद्राक्ष, लाल चंदन या स्फटिक की माला का उपयोग किया जा सकता है। साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। मंत्र का उच्चारण धीमी आवाज में, स्पष्टता और श्रद्धा के साथ करना उचित है।
जप के बाद प्रार्थना करें—
हे मां दुर्गा! मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें, मेरे पाप और अहंकार दूर करें तथा मुझे धर्म, सेवा और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।”*
किस समय कर सकते हैं जप
इस मंत्र का जप प्रतिदिन किया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि, अष्टमी, नवमी, पूर्णिमा और शुक्रवार को इसकी साधना विशेष फलदायी मानी जाती है। किसी दिवंगत व्यक्ति की आत्मशांति, परिवार के आध्यात्मिक कल्याण अथवा अपने भीतर वैराग्य और विवेक जगाने की भावना से भी इसका पाठ किया जा सकता है।
विशेष अनुष्ठान या बड़ी जप-संख्या किसी योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में करना उचित है। सामान्य भक्त श्रद्धापूर्वक इसका सरल दैनिक पाठ कर सकते हैं।
मुक्ति का वास्तविक मार्ग
मंत्र में स्वर्ग और मुक्ति की प्रार्थना अवश्य है, लेकिन धर्मग्रंथ कर्म, ज्ञान, भक्ति और सदाचार को भी आवश्यक मानते हैं। मंत्र-जप मन को दिशा देता है; उस दिशा में चलना मनुष्य के अपने आचरण पर निर्भर करता है।
लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध और द्वेष से मुक्त होना भी मोक्ष की यात्रा का हिस्सा है। दीन-दुखियों की सहायता, सत्य का पालन, माता-पिता और गुरु का सम्मान तथा किसी प्राणी को अनावश्यक कष्ट न देना देवी की वास्तविक आराधना मानी गई है।
यह मंत्र भक्त को स्मरण कराता है कि स्वर्ग की कामना से भी श्रेष्ठ सद्बुद्धि की कामना है। जब बुद्धि निर्मल होती है, तब कर्म शुभ होते हैं; शुभ कर्म से जीवन ऊंचा उठता है और आत्मज्ञान से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
