एक चुप्पी-सी छाई है
नीले से ‘सियाह’ हुए आसमान पर।
मेघों के घने समूह सहित, “चाँद ख़ामोश है।”
तारों का टिमटिमाना शिथिल, मंद पड़ा है।
‘रातरानी’ प्रायः गुमसुम रहती है।
चाँदनी शर्मिंदा है, इसलिए दर्श नहीं देती।
घुप अँधेरे के घूँघट में,
शर्मिंदगी से सना मुखड़ा छिपाए रहती है।
दरअसल, ये सारे मिलकर आधी रात में
घट जाने वाली ‘मनुष्योचित करतूतों’ पर
टकटकी नज़र गड़ाए,
अचंभित हो, इसी सोच में मग्न रहते हैं••••
दिवस के प्रकाश में क्या यही वे चेहरे हैं,
जो श्वेत, उजले, निर्मल प्राणी
होने का स्वाँग रचते हैं!
माया के अधीन, दौलत के नशे में लीन,
अपने कुचक्रों से उत्पन्न तमाम दागों को छिपाने,
ये धूर्त कलाकार,
दोहरा अभिनय निभाने वाले शातिर,
दो-चार मुखौटे सदैव अपनी जेब में धरे रखते हैं।
जाने कब, किस ‘नक़ाबरूपी मुखौटे’ की आवश्यकता आन पड़े!
कहीं से नारा गूँजता है—
“जय बोलो बेईमान की!”
बादल आपत्ति में गड़गड़ाने लगे
और बिजली रोष में ललकारने लगी!•••
✍️ — त्रिलोचन सिंह अरोरा
