मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : वोट पर वार... लोकतंत्र लाचार!

रुख-ए-सियासत : वोट पर वार… लोकतंत्र लाचार!

तौसीफ कुरैशी

लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है, वह मतदाता के विश्वास का दूसरा नाम है। जब मतदाता को यह आशंका होने लगे कि उसका नाम मतदाता सूची से गायब हो सकता है या जानबूझकर कर गायब किए जा रहे हैं, तब सवाल केवल एक वोट का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। यही वजह है कि कर्नाटक में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया अब महज एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति और जनसक्रियता की परीक्षा बन गई है। कांग्रेस ने इस चुनौती को केवल विरोध का मुद्दा नहीं बनाया, बल्कि संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर सक्रिय होकर इसका जवाब देने की कोशिश की है। राज्य सरकार उन नागरिकों को, जो निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी करते हैं, आवश्यक निवास संबंधी प्रमाण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज कर रही है, ताकि पात्र मतदाताओं को दस्तावेजों के अभाव में कठिनाई न हो। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन ने इसे बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर माना है। हजारों बूथ लेवल एजेंट तैयार किए गए हैं, जो मतदाताओं को प्रक्रिया समझाने, आवश्यक प्रपत्र भरवाने और जागरूकता पैâलाने में लगे हैं। राजनीति का यह पहलू दिलचस्प है।
लोकतंत्र में चुनाव केवल भाषणों और रैलियों से नहीं जीते जाते, बल्कि बूथों पर खड़े कार्यकर्ताओं की मेहनत से भी तय होते हैं। मतदाता सूची का हर नाम राजनीतिक दलों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना किसान के लिए खेत में उगा हर पौधा। इसलिए भाजपा भी अपने स्तर पर संगठन को सक्रिय कर रही है और प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि चुनावी राजनीति में कोई भी दल बूथ प्रबंधन की लड़ाई हारना नहीं चाहता। कर्नाटक का अनुभव यह भी बताता है कि यदि राज्य सरकार और संगठन एक साथ काम करें तो प्रशासनिक प्रक्रियाओं के दौरान नागरिकों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, यह भी उतना ही आवश्यक है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो। किसी भी लोकतंत्र की विश्वसनीयता इसी पर टिकी होती है कि पात्र मतदाता का नाम सूची में सुरक्षित रहे और किसी भी नागरिक को अनुचित रूप से मताधिकार से वंचित न होना पड़े।
आज कर्नाटक की राजनीतिक तस्वीर केवल सत्ता और विपक्ष की प्रतिस्पर्धा नहीं है। यह संगठन क्षमता, जनसंपर्क और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजगता की भी परीक्षा है। जो दल मतदाता तक सबसे पहले पहुंचेगा, वह उसकी बात सुनेगा और उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का भरोसा देगा, वही राजनीतिक बढ़त हासिल करेगा। अंतत: लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव आयोग, सरकार या राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जागरूक मतदाता है। यदि हर पात्र नागरिक अपने अधिकार के प्रति सचेत रहेगा और सभी संस्थाएं निष्पक्षता से अपनी जिम्मेदारी निभाएंगी, तभी लोकतंत्र की यह बिसात विश्वास के साथ आगे बढ़ेगी। क्योंकि लोकतंत्र की असली जीत किसी दल की नहीं, बल्कि उस आखिरी मतदाता की होती है, जिसका नाम मतदान सूची में सुरक्षित रहता है। सत्यमेव जयते

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