तौसीफ कुरैशी
-लेकिन जब चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठने लगें, तब चिंता केवल किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की होती है।
-ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि पार्टी गुटबाजी से ऊपर उठकर एक स्पष्ट और सर्वमान्य नेतृत्व प्रस्तुत करती है, तो वह फिर से मजबूत विकल्प बन सकती है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास और उसका वोट होता है। सत्ता चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, उसे अंतत: जनता के सामने जवाबदेह होना पड़ता है। लेकिन जब चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठने लगें, तब चिंता केवल किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की होती है।
हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने चुनावी निष्पक्षता को लेकर बहस को जन्म दिया है। कहीं विपक्षी उम्मीदवारों के नामांकन रद्द हुए, कहीं निर्विरोध चुनाव हुए और कहीं राजनीतिक दलों के बीच अचानक हुए बदलावों ने जनादेश की भावना पर प्रश्न खड़े किए। विपक्ष इन घटनाओं को एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में देखता है, जबकि सत्तापक्ष इन्हें कानूनी और प्रक्रियागत मामलों के रूप में प्रस्तुत करता है। सच चाहे जो हो, लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि चुनावी मैदान सभी दलों और उम्मीदवारों के लिए समान रूप से खुला और निष्पक्ष दिखाई दे। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। यह जनता की इच्छा, राजनीतिक मर्यादा और संस्थाओं की निष्पक्षता पर आधारित व्यवस्था है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में सरकारों के गठन तथा दल-बदल की घटनाओं ने भी यह सवाल उठाया है कि जनादेश का सम्मान किस प्रकार सुनिश्चित किया जाए। जनता हार-जीत को स्वीकार कर सकती है, लेकिन वह यह महसूस नहीं करना चाहती कि उसके वोट का महत्व कम किया जा रहा है।
भारत ने पिछले ७५ वर्षों में लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि अपने अधिकार और विश्वास के रूप में अपनाया है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनता का भरोसा बना रहे। अदालतें, चुनाव आयोग, राजनीतिक दल और संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र की रक्षा करती हैं, लेकिन उसकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास में निहित है। यदि मतदाता को यह भरोसा रहेगा कि उसका वोट निर्णायक है और चुनाव निष्पक्ष हैं, तो लोकतंत्र मजबूत होगा। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही `सत्यमेव जयते’ का वास्तविक अर्थ भी है।
राजस्थान का सबक गुटबाजी छोड़ो, सत्ता जोड़ो!
राजस्थान की राजनीति केवल चुनावी नतीजों से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक संस्कृति से समझी जा सकती है। हिंदी पट्टी में यह कांग्रेस की सबसे मजबूत वैचारिक जमीन मानी जाती रही है। इसकी वजह केवल सत्ता में लंबे समय तक बने रहना नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने की उसकी परंपरा भी रही है।
१९६७ में जब देश के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी गठबंधनों ने सत्ता हासिल की, तब भी राजस्थान में कांग्रेस का आधार अपेक्षाकृत मजबूत बना रहा। १९७७ की कांग्रेस विरोधी लहर ने जरूर उसे झटका दिया, लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस बार-बार सत्ता में लौटती रही। यह बताता है कि राजस्थान में किसी एक नेता से ज्यादा पार्टी का संगठन और जनाधार महत्वपूर्ण रहा है। राज्य ने नवल किशोर शर्मा, राजेश पायलट, नटवर सिंह, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा और परसराम मदेरणा जैसे कई बड़े नेताओं को देखा, लेकिन कांग्रेस कभी किसी एक चेहरे पर निर्भर नहीं रही। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। आज भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता हैं, लेकिन राजस्थान कांग्रेस का भविष्य केवल इन्हीं दो नामों तक सीमित नहीं हो सकता। २०२३ के विधानसभा चुनाव में दोनों खेमों के टकराव ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया और भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला। भाजपा भी यह समझती है कि कांग्रेस की आंतरिक खींचतान उसके लिए सबसे बड़ा अवसर है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि पार्टी गुटबाजी से ऊपर उठकर एक स्पष्ट और सर्वमान्य नेतृत्व प्रस्तुत करती है, तो वह फिर से मजबूत विकल्प बन सकती है। राजस्थान का इतिहास बताता है कि यहां कांग्रेस की असली ताकत व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक संस्कृति, संगठन और कार्यकर्ता हैं। २०२८ का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि स्थिरता और अंतर्कलह के बीच भी संघर्ष होगा। जो दल एकजुटता, स्पष्ट नेतृत्व और भरोसा देने में सफल होगा, जनता उसी के साथ खड़ी दिखाई दे सकती है।
