प्रणव प्रियदर्शी
सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र पर स्वाभाविक ही सबकी नजरें टिकी हैं। हालांकि, किसी भी संसदीय लोकतंत्र में संसद का हर सत्र विपक्ष के लिए मौका और सत्ता पक्ष के लिए चुनौती होता है। सत्ता पक्ष स्वाभाविक ही चाहता है कि सभी मंत्रालय संबंधित तथ्यों और आंकड़ों के साथ विपक्षी हमलों के ठोस और तर्कपूर्ण उत्तर देने को तैयार रहें, ताकि यह न लगे कि सत्ता पक्ष के पास विपक्ष की बातों का जवाब नहीं है या विपक्ष सरकार पर हावी हो गया। इस स्थिति में बदलाव यह आया है कि अब संसद में बहस कम होती है और शोर-शराबा ज्यादा। पिछले कुछ सत्रों में तो नौबत यहां तक आ गई कि विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के सदस्य भी हंगामा, नारेबाजी करते दिखने लगे हैं।
शक्ति का समीकरण
असल मुद्दा यह है कि मोदी सरकार के लिए लोकतंत्र की अन्य तमाम संस्थाओं की तरह संसद में भी अच्छे प्रदर्शन की सबसे बड़ी कसौटी यही हो गई है कि वहां शक्ति का समीकरण उसके पक्ष में इस कदर झुका रहे कि विपक्ष या तो कुछ खास बोल ही न सके या बोले भी तो उसकी बातों को गंभीरता से लेने की कोई जरूरत न महसूस की जाए। पिछली सरकारों की तुलना में मौजूदा सरकार के कार्यकाल को देखें तो हर महत्वपूर्ण संस्था के साथ यही करने की कोशिश की गई है।
मीडिया बनी गोदी मीडिया
मीडिया में अपनी ताकत इस सरकार ने कुछ इस तरह से स्थापित की है कि मुख्यधारा मीडिया को गोदी मीडिया ही कहा जाने लगा। वहां पत्रकार जैसे सत्ता से सवाल करना ही भूल गए। जो थोड़ी-बहुत आलोचना करते दिखते भी हैं तो इस तरह से करते हैं कि सरकार को उन सवालों की धार न महसूस हो। चुनाव आयोग को कभी एक स्वतंत्र संस्था माना जाता था। अब यह सरकार के दावों में ही स्वतंत्र दिखता है। इसकी विश्वसनीयता का तो यह आलम है कि यह विपक्ष का विश्वास जीतने की कोशिश भी नहीं करता।
बहुमत की विशालता
संसद में सरकार को बहुमत तो हासिल होता ही है, मगर उसका दबदबा बनता है इस बहुमत की विशालता से। २०१४ में बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया था, एनडीए को मिलाकर यह संख्या और भी बड़ी हो जाती थी। २०१९ के लोकसभा चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सीटों का यह अंतर और बढ़ गया, लेकिन २०२४ में बीजेपी बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े से भी पीछे रह गई। एनडीए के घटक दलों की बदौलत मोदी जी ने सरकार तो बना ली, लेकिन संसद में विपक्ष का हौसला और उसके तेवर बढ़े हुए थे।
अनोखा तरीका
इस चुनौती से निपटने का एक तरीका यह था कि सरकार अपने कामकाज का स्तर सुधारती, विपक्ष को हमले का मौका नहीं देती। विपक्ष जो भी कमियां बताता, उन्हें जल्द से जल्द दूर करती और अगर विपक्ष कोई निराधार आरोप लगाता तो देशवासियों के सामने उसे एक्सपोज करती। मगर मोदी सरकार ने मानो प्रण कर लिया कि वह अब आगे कोई चुनाव हारेगी ही नहीं। न विपक्ष जीतेगा और न उसका हौसला बढ़ेगा। इस नीति पर चलते हुए बीजेपी लोकसभा चुनाव के बाद हुए विभिन्न राज्यों के सारे अहम विधानसभा चुनाव जीतती रही। इन जीतों पर सवाल भी उठे, लेकिन उन सवालों के जवाब देना तो दूर, उसने उन पर ध्यान तक देने की जहमत नहीं मोल ली।
थोक दल-बदल अभियान
और अब तो इसने विभिन्न दलों के सांसदों को तोड़ने का अभियान भी युद्धस्तर पर शुरू कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस के नवनिर्वाचित विधायक ही नहीं, २० सांसद भी पार्टी नेतृत्व से अलग हो गए। शिवसेना के छह सांसद भी अपने पार्टी नेतृत्व से नाता तोड़ शिंदे गुट में चले गए। कई अन्य दलो के सांसदों के भी विपक्षी खेमे से सत्तापक्ष में आने की चर्चा है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार इस थोक दल-बदल अभियान के जरिए परिसीमन विधेयक को पास करने की चुनौती पार करना चाहती है। लेकिन इन सारी कवायदों के बावजूद वह दो तिहाई के आंकड़े से काफी दूर है।
राम रक्षा आंदोलन
फिलहाल तो यही लगता है कि वह विपक्ष को अपनी धौंस में रखना चाहती है, उसे दिखाना चाहती है कि न तो तुम्हारे सांसद सुरक्षित हैं और न पार्टी। लेकिन उसकी बेचारगी का आलम यह है कि इतना सब करके भी विपक्ष का प्रभाव कम नहीं हो रहा। शिवसेना के सांसद उसने भले तोड़ लिए हों, पार्टी की ओर से शुरू किया गया राम रक्षा आंदोलन उसे बेचैन किए हुए है। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी प्रकरण की ओर से ध्यान हटाने की कोशिशों को यह आंदोलन नाकाम कर दे रहा है।
छात्रों की गूंज
नीट पेपर लीक जैसे आरोपों पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज नाम से जो अभियान शुरू किया है, उसकी सफलता भी सत्ता पक्ष के लिए कम चिंताजनक नहीं है। विदेश से अभिजीत दीपके के आने और सोनम वांगचुक के अनशन शुरू करने को लेकर सही-गलत जो भी कहा जा रहा हो, तथ्य यह है कि इससे राहुल गांधी के आंदोलन की चमक कम नहीं हुई। उलटे यह मुद्दा और ज्यादा उभरकर सामने आ गया। अब संसद में इस मसले की और जोरदार गूंज सुनाई देने के आसार बढ़ गए हैं।
अगला इल्जाम क्या
ऐसे में देखना होगा कि मोदी सरकार वोट चोरी, चुनाव चोरी और सांसद चोरी के आरोपों से गुजरने के बाद अब क्या संसद चोरी के आरोप आमंत्रित करने की ओर बढ़ेगी?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
