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श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन का महत्व

-मान्यता—ब्राह्मणों के साथ वायुरूप में भोजन ग्रहण करते हैं पितर; शुद्धता, पात्रता और सम्मान का रखना चाहिए ध्यान

पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और दान के साथ ब्राह्मण भोजन कराने की प्राचीन परंपरा है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मणों के साथ पितर वायुरूप में उपस्थित होते हैं और उनके माध्यम से अन्न ग्रहण करते हैं। इसी मान्यता के कारण ब्राह्मण को श्रद्धा और सम्मानपूर्वक भोजन कराने को पितरों की तृप्ति का माध्यम माना गया है।
लेकिन श्राद्ध का उद्देश्य केवल किसी को भोजन कराकर औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इसके लिए भोजन की शुद्धता, भोजन ग्रहण करने वाले व्यक्ति की पात्रता और श्राद्धकर्ता की भावना—तीनों महत्वपूर्ण हैं।
योग्य व्यक्ति का करें चयन
परंपरागत रूप से वेद-अध्ययन करने वाले, सदाचारी और धार्मिक जीवन जीने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। निमंत्रण श्राद्ध तिथि से एक दिन पहले विनम्रतापूर्वक देना चाहिए।
योग्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो किसी भूखे, जरूरतमंद, विद्यार्थी, साधु अथवा असहाय व्यक्ति को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जा सकता है। भोजन कराने के पीछे सेवा, दया और पितरों के प्रति श्रद्धा का भाव सबसे महत्वपूर्ण है।
भोजन में क्या बनाएं?
श्राद्ध का भोजन सात्त्विक, स्वच्छ और ताजा होना चाहिए। इसमें पितरों को पसंद रहे व्यंजन विशेष रूप से बनाए जा सकते हैं। सामान्यतः खीर, पूड़ी, चावल, दाल, सब्जी, दूध, दही, घी और मिठाई का प्रयोग किया जाता है।
लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा तथा अत्यधिक तामसिक भोजन से बचने की परंपरा है। परिवार के कुलाचार और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार सामग्री में अंतर हो सकता है।
पहले निकालें पंचबलि
ब्राह्मण भोजन से पहले तैयार अन्न के पांच भाग निकालें—
– गाय के लिए
– कुत्ते के लिए
– कौए के लिए
– देवताओं के लिए
– चींटियों एवं छोटे जीवों के लिए
इसके बाद जल, अक्षत, तिल, चंदन और पुष्प हाथ में लेकर पूर्वजों के नाम से भोजन कराने का संकल्प करें।
सम्मान से भोजन और विदाई
ब्राह्मण अथवा अतिथि को शांत वातावरण में प्रेमपूर्वक भोजन परोसें। बार-बार आग्रह अवश्य करें, लेकिन उनकी इच्छा से अधिक खाने का दबाव न डालें। भोजन के समय अपमान, क्रोध, विवाद और जल्दबाजी से बचना चाहिए।
भोजन के बाद तिलक लगाकर यथाशक्ति अन्न, वस्त्र या दक्षिणा दें। आशीर्वाद लेकर उन्हें घर के द्वार तक सम्मानपूर्वक विदा करें। इसके बाद ही परिवार और रिश्तेदारों को भोजन कराने की परंपरा है।
ब्राह्मण भोजन का व्यापक संदेश है कि पूर्वजों की स्मृति में किसी योग्य अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को तृप्त किया जाए। यदि कर्मकांड हो लेकिन मन में सम्मान न हो तो श्राद्ध का मूल भाव अधूरा रह जाता है। श्रद्धा, सेवा और विनम्रता ही इस परंपरा की आत्मा हैं।

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