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व्यवस्था का आक्रोश

एक युवा बनने चला भगत, व्यवस्था पर आक्रोशित था;
बिना लाइसेंस के हाथ में, अग्न्यास्त्र शोभित था।

भला क्या ज्ञात नहीं था उसे, कि शासन का तंत्र है यहां?
लोकतंत्र की मर्यादा का, पूर्ण स्वतंत्रता है जहां ।

माना स्वतंत्रता है भ्रष्टाचार, अनर्गल प्रलाप की;
कर्तव्य-मूढ़ता, अनावश्यक आक्षेप, अमर्यादित व्यवहार की।

​माना तुम जन-सेवा में थे, दुख-दर्द में सहभागी भी;
पर धरना-प्रदर्शन में भी, तुम स्वयं अग्रगामी भी।

सुधार न जब हुआ तो फिर, निर्णय को स्वयं क्यों नहीं बदला?
जिसके लिए लड़ा, वहीं महापंचायत विरोध के लिए चला?

​राजनीति और टीआरपी का, हो रहा अब यहां हाहाकार;
समर्थन और विरोधों में, पिसा है मुद्दा और जन-व्यवहार।

व्यवस्था के लिए भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार में ही व्यवस्था है;
सच बोलने की कोशिश में, यहां दम तोड़ती आस्था है।

​आवाज उठाओगे तो फिर, कुचल दिए जाओगे तुम यहां;
भगत, चंद्रशेखर की तख्तियां, बस रह जाएंगी यहां।

न स्वयं को कुछ दिया तुमने, न समाज को ही कुछ दे पाया;
कानून का शासन है भाई, तुमने यह क्यों न समझ पाया?

माना कानून मानते नहीं हैं यहां, पर हर जगह लिखा है;
कार्यालय की दीवारों पर भी कि कानून का शासन है।

​किताबों में लिखा है जो, उसे सब जानते तो हैं,
पर मानते क्यों नहीं कोई? यही हम आज पूछते हैं।

नरेन्द्र कुमार
बचरी (तापा), अखगांव, भोजपुर (आरा), बिहार
वार्ता सूत्र

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