अंदर तू है, बाहर तू है,
हर स्थान पर अहसास तेरा है।
जब-जब तुझे खोजने जाऊं,
होता नहीं कभी दृष्टिगत तू।
अंदर तू है, बाहर तू है,
हर स्थान पर अहसास तेरा है।
जब-जब तुझे खोजने जाऊं“,
होता नहीं दृष्टिगत तू।
अनेक रंग भरे धरा पर,
पुष्प, पशु, पंछी, इंद्रधनुष,
रंगा तूने ही सबको।
सब रंग तुझसे, पर
किसी रंग में मुझे दिखा न तू।
वाणी तेरी ही देन,
पवन, झरनों, कलरव, पक्षियों का।
हे! तेरे दिए सप्त स्वर,
समाया अनहद नाद में तू।
कण-कण में तेरी हस्ती,
पिपीलिका से कुंजर तक।
सबकी क्षुधा तू ही हरता,
तू ही सबका पालनकर्ता।
तेरा भोजन क्या है,
अब तक कोई जान न पाया।
तेरी सृष्टि का सूत्रधार तू,
कौन-सी ओट में छुपा है तू?
रहस्य तेरा कोई जान न पाया।
भक्तों, संतों को तूने अपनाया,
फिर भी एक राह तुझको पाने की
कोई जान न पाया।
कहते तुझको तू है
भोलाभाला, पर
तेरा मार्ग बड़ा निराला।
बेला विरदी
