रवीन्द्र मिश्रा / मुंबई
सर्व पितृ अमावस्या के अवसर पर विंध्यवासिनी मंदिर के उत्तर तट स्थित हरसिंहपुर गांव के गंगा घाट पर हजारों श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की मोक्ष के लिए पिंडदान किया। श्रद्धालुओं को पिंड दान कराने ग्राम श्री पट्टी से पधारे पंडित आचार्य कमलेश कुमार दूबे ने श्रद्धालुओं को बताया कि पितरों के लिए किए जा रहे पिंडदान की परंपरा सतयुग से चली आ रही है। सतयुग में सर्व प्रथम ब्रह्मा जी ने गया में पिंडदान किया था। पितृपक्ष में पिंडदान की क्रिया बताते हुए पंडित जी ने कहा कि मृतात्मा के तर्पण के लिए जौ का आंटा,चावल का आटा अथवा दूध से बने खोवा (मावा) तथा काला तिल, घी शहद व दूध मिलाकर 16 पिंड बनाए जाते हैं, जिन्हें पूर्वजों को याद कर उनका तर्पण किया जाता है। पितृपक्ष में अक्सर लोग अपने पितरों को याद करते हुए पितृ अमावस्या तक पहले उन्हें जल समर्पित करते हैं। उसके बाद पितृ अमावस्या जिसे आम भाषा मे लोग पितृ स्मरण दिवस के रूप में याद करते हैं उन्हें किसी नदी, तालाब अथवा गया तीर्थ में पहुंच कर उनका पिंडदान करते हैं तथा मुंडन कराते हैं। वायु पुराण की कथा अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचते समय गयासुर नामक एक दैत्य उत्पन्न किया था। उस दैत्य ने कोलाहल पर्वत पर जाकर भगवान विष्णु की घोर तपस्या किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वर मांगने को कहा। उसने वर मांगते हुए कहा कि जो कोई जीव यहां आकर मुझे स्पर्श करेगा उन सभी जीवों को मुक्ति मिलेगी। इसलिए लोग गया तीर्थ में जाकर विष्णु पद तथा गयासुर का दर्शन एवं स्पर्श कर अपने पूर्वजों के लिए मुक्ति की कामना करते हैं। रवीवार 21 सितंबर के दिन सुबह 5बजे से दोपहर दो बजे तक भदोही, सुरियावां, पखवयिआ, दलपतपुर, खमरिया, चेतगंज, नगवगपुर, तिलठी, मिश्रधाप, श्रीपट्टी, हरसिंहपुर, मल्लैपुर, सिता का अडा़र आदि गांवों के सैकड़ों लोग गंगा के किनारे पहुंच कर अपने पूर्वजों को स्मरण कर उनका पिंडदान किया। श्रद्धालुओं ने पितृपक्ष के अंतिम दिन अपने सभी ज्ञात अज्ञात पूर्वजों को नमन कर उनका आशीर्वाद मांगते हुए कहा कि आपका दिया हुआ जीवन तथा आशीर्वाद ही हमारी सबसे बड़ी दौलत है। हम ईश्वर से आपकी आत्मा तथा सद्गति के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।
