हिमांशु राज़
भारतीय सिनेमा के आकाश में कुछ तारे ऐसे होते हैं, जिनकी चमक हल्की होते हुए भी आंखों में अमिट छवि छोड़ जाती है—जैसे कोमल सांझ की रोशनी या जाती शाम का सुनहरा आलोक, जो क्षितिज पर देर तक ठहरा रहता है। पवन मल्होत्रा उसी प्रकाश-रेखा के धीर, आत्मलीन नायक हैं। उनके अभिनय में कोई ढोल-ढमाका, कोई अलंकार नहीं; वहाँ सादगी है, जीवन की अलक्षित पीड़ा है, अनुभूति की लयबद्ध तरलता है—जैसे किसी पुरानी गली में आती मौन हवा, जो अनायास ही दिल को छू जाती है। दिल्ली के शोरगुल भरे रास्तों की धूल भरी यात्राओं से निकला यह अभिनेता—पवन—कला के पावन स्वरूप को जीता है। उसका अभ्यास रंगमंच की भीड़भरी पंक्तियों या फिल्म के भव्य सेटों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की साधारणता में है। ‘गांधी’, ‘जाने भी दो यारो’, ‘अर्ध सत्य’ जैसी फिल्मों में उनके छोटे-छोटे भाव, सहायक की छांव में धीरे-धीरे उग आये इस अभिनेता ने ‘नुक्कड़’ के गुरचन की मुस्कान में जैसे पूरे समाज की मासूम धड़कन बुन दी। उस किरदार की सरलता, उसकी मिठास, जैसे सुबह के तवे पर सिकती पहली रोटी की सौंधी गंध। पवन का सौंदर्य उनके अभिनय की मौनता से जन्म लेता है। ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ में उन्होंने एक अस्थिर, उद्वेलित आत्मा को इस तरह जिया कि वह किरदार सिर्फ फिल्मी कैनवास का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज के दिल की अतल गहराइयों में पैबस्त हो गया। वह आकृति, उसकी बेचैनी, वह खामोश विद्रोह—यहीं से पवन के अभिनय में विचारशीलता की कविता आकार लेती है, जहां शब्द पीछे छूट जाते हैं, और आंखें संवाद करती हैं। उनके अभिनय की गाथा बाहर से सुनाई नहीं पड़ती—बल्कि भीतर से महसूस होती है। ‘ब्लैक फ्राइडे’ का कठोर पुलिसवाला हो या ‘डॉन’ का सधे कदमों वाला सहायक—हर किरदार में वे इतने समाहित हो जाते हैं कि अभिनेता और चरित्र के बीच की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। ‘भाग मिल्खा भाग’ का गुरु—जिसकी अनुशासनबद्ध उदासी भी शिष्य के लिए वरदान हो जाती है; ‘दिल्ली-6’ का आम आदमी—जिसकी मुस्कान में मोहल्ले की पूरी कहानी समेटी हो। ओटीटी के नवप्रभात में पवन मल्होत्रा का अभिनय जैसे सिनेमा की आत्मा को पुनः खोजता है। ‘टब्बर’ का वह पिता—जिसकी उदास छाया, खामोश विद्रोह और आंखों में पलता तूफान—इन सबमें पवन ने एक सांगीतिक गहराई रची। यहाँ अभिनय नहीं, आत्मा की पुकार थी; एक पिता की लाचार चीख, जो उसके होठों से कभी शब्द नहीं बनती—लेकिन संपूर्ण कथानक पर छाई रहती है। ‘कोर्ट कचहरी’ में न्यायपीठ पर बैठा व्यक्ति पवन के भीतर के दार्शनिक से साक्षात्कार करता है—ऐसा जज, जो हर फैसले के साथ अपनी ही आत्मा के रंध्र-रंध्र से गुजरता है। वहाँ निर्णय केवल कानून नहीं, आत्ममंथन भी होता है। अभिनय का यह ताप और आत्मालोचन, कम ही कलाकारों के हिस्से आता है। समकालीन फिल्मों में—चाहे ‘ओएमजी 2’ के मूल्यों का संघर्ष हो, ‘मिशन रानीगंज’ या ’72 हूरें’ जैसी संवेदनात्मक भूमिकाएँ हों—पवन हर किरदार को अपने व्यक्तित्व की सांचे में ऐसा ढाल देते हैं कि हर फुसफुसाहट, हर चुप्पी, हर संशय एक गीत-सरीखी प्रतीत होती है। ‘फौजा’ जैसी हरियाणवी फिल्म ने उनकी कला को राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में पहचाना—यह पुरस्कार बस एक प्रतीक है, उनके निर्विकार और सात्विक अभिनय-सरोवर का छोर-भर। पवन मल्होत्रा अभिनय की उस शिल्प-परंपरा के वाहक हैं, जहाँ कला कभी बाज़ार की शर्तों पर नहीं उतरती। उनके किरदार मौन हैं, लेकिन उस मौन में अनगिनत अर्थ-मेल हैं। वे जब अभिनय करते हैं, तो सिर्फ दृश्य में शामिल नहीं रहते—विज्ञान और हृदय के संयोग से, विचार और संवेदना के संगम से, वे एक नया संसार रच देते हैं। आज जब सिनेमा में हर तरफ त्वरा है, ग्लैमर का शोर है, पवन की उपस्थिति उस गूढ़ नीरवता की तरह है, जिसके बिना कोई रचना पूरी ही नहीं होती। वे अभिनेता नहीं, एक यात्रा हैं—जो साधना में प्रवाहित होती है, और दर्शकों के लिए अनुभव की थाती छोड़ जाती है। उनकी कला अपनी ही लौ में जलता वह दीपक है—शांत, अडिग, लेकिन बेहद जरूरी; जो बिना बोले भी पूरा जीवन सुना जाता है। रचना और संवेदना का ऐसा संतुलन, जिसमें अभिनय केवल शिल्प नहीं, एक आत्मीय साक्षात्कार बन जाए, अभिनय का अनहद नाद बन जाये — यही है पवन मल्होत्रा।
