जय सिंह
१९९३ के बम विस्फोट के पांच साल बाद भी जब पूरा देश दहशतगर्दी के दर्द और क्रोध से जल रहा था, उसी दौर में भारत का सबसे वांछित अपराधी दाऊद इब्राहिम बेखौफ होकर नेपाल में दाखिल होता और निकल जाता रहा। नेपाल की शांत घाटियों, राजनीतिक हलचलों और सुरक्षा ढांचे की कमियों ने उसे लंबे समय तक हिंदुस्थानी गैंगस्टरों की सुरक्षित शरणस्थली बनाए रखा। दाऊद की मौजूदगी की दर्जनों सूचनाएं तो थीं, लेकिन उन पर कार्रवाई? लगभग नहीं के बराबर।
काठमांडू अंडरवर्ल्ड का ‘राजनयिक’ खेल
अधिकृत सूत्रों के मुताबिक, दाऊद ६ से ९ अप्रैल, १९९८ के बीच काठमांडू में मौजूद था। उसी दौरान रॉयल आर्मी ने दाऊद के सहयोगी मिर्जा दिलशाद बेग के आवास पर कड़ी नजर रखी। सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा बलों को दाऊद का हमशक्ल भी दिखाई दिया था, लेकिन इस जानकारी का उपयोग नहीं हो सका या तो सिस्टम असहाय था या फिर किसी स्तर पर अनकहे संरक्षण की परतें पैâली थीं। दाऊद बिना किसी रुकावट के गायब हो गया। नेपाल, जहां राजनीतिक अस्थिरता उस समय चरम पर थी, दाऊद जैसे अपराधियों के लिए एक तरह से ‘नो-रिस्क जोन’ बन चुका था।
सत्ता के गलियारों में दस्तक!
उसी वर्ष फरवरी १९९८ दाऊद एक बार फिर नेपाल पहुंचा।
यह सिर्फ कोई गुप्त यात्रा नहीं थी। सूत्रों के अनुसार, उसने नेपाल के प्रधानमंत्री लोकेंद्र बहादुर थापा और कुछ मंत्रियों से मिलने की कोशिश की और टीआर (ट्रांजिट रूट) के जरिए तस्करी की इजाजत के बदले १५ करोड़ रुपए की पेशकश भी की।
यह प्रसंग नेपाल के राजनीतिक ढांचे में उस समय मौजूद दरारों का साफ सबूत था। दाऊद सिर्फ अपराधी नहीं था, वह एक ऐसा नेटवर्क बन चुका था जो सरकारों से सौदे करने की स्थिति में पहुंच चुका था।
काठमांडू का ‘सेफ हाउस’
१९९८ की ही एक और कड़ी बताती है कि दाऊद का सबसे करीबी सहयोगी छोटा शकील सितंबर के पहले सप्ताह में हांग-कांग से नेपाल पहुंचा। उसकी मौजूदगी लगभग हर बार नूर-उल-इस्लाम उर्फ गामा एट ज्याथा के घर में दर्ज की गई। यह घर संयोग से नहीं, बल्कि रणनीति से निर्वाचन आयुक्त कार्यालय के ठीक सामने था।
ऐसी जगह जहां किसी को शक भी कम होता और निगरानी भी कठिन।
‘नूरा’ का नेपाल कनेक्शन
दाऊद का भाई नूरा इब्राहिम, जो अब इस दुनिया में नहीं है, फरवरी १९९८ में काठमांडू पहुंचा और होटल करनाली में ठहरा। होटल करनाली उस समय आईएसआई एजेंटों की सुरक्षित पनाहगाह के रूप में कुख्यात था, जहां भारतीय खुफिया एजेंसियां शायद ही कभी पहुंच पातीं।
बाद में २० अप्रैल १९९९ को नामदेव गौतम, सलीम मिलान अंसारी और खूम बहादुर खड़का ने नूरा को फिर नेपाल बुलाया।
इस बार उसके साथ शेख लुक़मान फारुखी भी था। दोनों दुबई से कराची और वहां से नेपाल पहुंचे थे। शक है कि नूरा सरफराज अहमद नाम के पाकिस्तानी पासपोर्ट पर आया था। यह सिर्फ अपराध की कहानी नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचानों के खेल की मिसाल थी
नेपाल में निवेश
सिर्फ आना-जाना ही नहीं दाऊद ने नेपाल में मेसर्स स्पेश टाइम नेटवर्क कंपनी में निवेश भी किया था। यह निवेश दरअसल एक बड़े ऑपरेशन का हिस्सा था, जिसमें नेपाल एक लॉजिस्टिक हब, तस्करी रूट और फाइनेंसियल वॉल्व की तरह इस्तेमाल हो रहा था।
नेपाल ही क्यों?
नेपाल उस दौर में तीन वजहों से अपराधियों के लिए स्वर्ग बन चुका था। एक खुली सीमा बिना वीजा यात्रा हिंदुस्थान-नेपाल की खुली सीमा ने दाऊद के नेटवर्क को लगभग बिना रुकावट मूवमेंट की सुविधा दी! राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते। सरकारें बदलती रहीं, सत्ता टिकी नहीं और अंडरवर्ल्ड अपने पैर जमाता गया।
खुफिया एजेंसियों की सीमित कार्यक्षमता
भारतीय एजेंसियां सीमा-पार कार्रवाई नहीं कर सकती थीं और नेपाली प्रतिष्ठान अक्सर दबाव या सौदेबाजी के बीच झूलते थे।
दाऊद का नेटवर्क
नेपाल में ९० के दशक के उत्तरार्ध तक फलता-फूलता रहा।
राजनीति, व्यापार और सीमा के बीच छिपा एक ऐसा खेल, जिसने हिंदुस्थानी अंडरवर्ल्ड को दुबई और कराची के बाद काठमांडू में तीसरा सबसे सुरक्षित ठिकाना दे दिया।
