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वोटर लिस्ट का डिजिटल खेल!

-उमन गुप्ता

-बंगाल के लिए सॉफ्टवेयर में अलग पहरा, चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल!

मतदाता का नाम वोटर लिस्ट में रहेगा या कटेगा, यह तय करने वाली चुनावी प्रक्रिया में अगर सॉफ्टवेयर के भीतर ही राज्य के हिसाब से अलग-अलग पहुंच की व्यवस्था दिखाई दे, तो सवाल उठना लाजिमी है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में ईसीआईनेट के कोड ऑडिट ने निर्वाचन अधिकारियों की कुछ डिजिटल सुविधाओं तक पहुंच पर संभावित प्रतिबंध का मुद्दा उठाया है। क्या यह तकनीकी गड़बड़ी थी, प्रशासनिक पैâसला या किसी खास व्यवस्था के तहत किया गया बदलाव? इसका जवाब चुनाव आयोग को दस्तावेजों के साथ देना चाहिए। हालांकि, कोड में प्रतिबंध का प्रावधान मिलने से यह साबित नहीं होता कि वह वास्तव में लागू हुआ या इससे किसी मतदाता का नाम हटाया गया। लोकतंत्र में मतदाता सूची की निष्पक्षता पर संदेह दूर करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है क्योंकि सवाल सिर्फ सॉफ्टवेयर का नहीं, मतदाता के अधिकार और चुनावी पारदर्शिता का भी है।
अलग व्यवस्था क्यों?
ईसीआईनेट जनवरी २०२६ में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य चुनाव अधिकारियों के लिए अलग-अलग डिजिटल सेवाओं और पोर्टलों को एक मंच पर लाना था। लेकिन इस मंच के कामकाज को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण बढ़ने और जमीनी अधिकारियों की पहुंच सीमित होने को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि मतदाता सूची तैयार करने, दावों और आपत्तियों पर सुनवाई करने तथा नाम जोड़ने या हटाने की जिम्मेदारी कानून के तहत निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की होती है। यदि अधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी तो बरकरार रहे, लेकिन उसे काम करने के लिए जरूरी डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध न हों, तो प्रशासनिक जवाबदेही और वास्तविक अधिकार के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
पश्चिम बंगाल के मामले में ऑडिट ने दो सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिलाया है, मतदाता के एन्यूमरेशन फॉर्म का विवरण देखने का विकल्प और नोटिस-सुनवाई डैशबोर्ड। इन सुविधाओं तक पहुंच प्रभावित होने पर अधिकारियों के लिए दस्तावेजों की जांच तथा सुनवाई की प्रक्रिया पर नजर रखना कठिन हो सकता है। हालांकि, यह संभावित प्रभाव है; ऑडिट ने यह साबित नहीं किया कि किसी मतदाता का नाम इसी कारण हटाया गया या किसी अधिकारी की कार्रवाई वास्तव में रोकी गई। चुनाव आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के लिए अलग प्रतिबंध कोड में क्यों रखा गया था, इसे किस अधिकारी या समिति ने मंजूरी दी और क्या यह प्रतिबंध सर्वर स्तर पर भी लागू था। साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि इस सुविधा से संबंधित लॉग, आदेश और तकनीकी बदलावों का रिकॉर्ड उपलब्ध है या नहीं।
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने भी एसआईआर से जुड़ी सॉफ्टवेयर व्यवस्था, उसके नियमों, ठेकों और मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों के आंकड़ों पर सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी है। इससे स्पष्ट है कि विवाद केवल एक कोडिंग विकल्प तक सीमित नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल हो रही तकनीक की पारदर्शिता से भी जुड़ा है।

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