सामना संवाददाता / मुंबई
प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहाँ तिलक नगर में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा एक ही है। उनके नाम उपासना पद्धतियां विभिन्न हो सकती हैं। हम सभी एक ही सर्वशक्तिमान की संतान हैं जो जीव मात्र का परम सुह्रदय हितैषी है। परमात्मा किसी से भी दूर नहीं है, लेकिन स्वार्थ के दलदल में फंसे इंसान की गति ऐसी है कि वह अपने भीतर स्थित परमात्मा को नहीं पहचान पा रहा है। सत्य को पहचानना,धर्म को पहचानना,दया को अपनाना, शांति मार्ग का चयन करना व क्षमादान में निपुणता ही परमात्मा का सत्य रूप है। सच्चा सुख आनंद व शांति एकमात्र परमात्मा व अध्यात्म की शरण में ही है। परमात्मा से प्रेम, समाज की सेवा व स्वयं की खोज करें। जो प्रभु समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं उनकी हर प्रकार से देखभाल व रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं। लौकिक उन्नति बुरी नहीं, लेकिन प्रभु से विमुख उन्नति अवनति के समान ही है।
उन्होंने कहा कि मत,पंथ व संप्रदाय विभिन्न हो सकते हैं लेकिन धर्म एक ही है जो हमें राष्ट्रीयता,नैतिकता,मानवता व पारसस्परिक सौहार्द का संदेश देता है। जो आपस में लड़ना सिखाएं या हिंसा का संदेश दे वो धर्म नहीं हो सकता। धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं । लेकिन दुर्भाग्यवश आज लोग धर्म के नाम पर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, व तोड़ रहे हैं जो शर्मनाक है। धर्म विज्ञान सम्मत है ढकोसला नहीं। धर्म व विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं कहना भी अतिश्योक्ति नहीं। धर्म से विज्ञान दूर होने पर ही ढोंग, पाखंड,अन्धविश्वास एवं रूढिवादिताओं को बढ़ावा मिलता है। धर्म विहीन विज्ञान भी विकास का नहीं विनाश का कारण बनेगा।आज धर्म के अनुष्ठान बहुत बढ़ रहे हैं लेकिन आचरण अपेक्षाकृत उतना नहीं बढ़ रहा , जबकि धर्म मात्र अनुष्ठान का नहीं अपितु आचरण का विषय है। जीवन का अभिन्न अंग बन जाए धर्म। हर क्रियाकलाप में जुड़ जाए धर्म तो समाज में व्याप्त बुराइयाँ , विकृतियाँ व विकार हमारे जीवन में प्रवेश नहीं कर पाएंगे ।
उन्होंने कहा कि प्यार बहुत ही छोटा सा शब्द है अगर सच्चा हो तो सारी दुनिया का मालिक भी इससे वश में हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। प्रेम ही ईश्वर है, ईश्वर ही प्रेम है। बशर्ते वह प्रेम विशुद्ध हो, निष्काम हो, निस्वार्थ हो, निष्कपट हों ऐसा विशुद्ध , निस्स्वार्थ, निष्कपट प्रेम परमात्मा का ही स्वरूप है जब यह स्वभाविक हमारे मन में उत्पन्न हो तो लगता है कि सामने वाला कौन है कही ये साक्षात परमात्मा तो नहीं है। लेकिन स्थिर नहीं रहती है बुद्धि, प्रेम, आस्था विश्वास। ये परमात्मा नहीं है तो परमात्मा का कोई निकट जन है ये सदियों से लगता आया है क्योंकि अंत में स्वाभाविक प्रेम परमात्मा या परमात्मा के निज जन के प्रति ही उत्पन्न हो सकता है। परंतु आज दुर्भाग्यवश इसी प्रेम का अभाव सर्वत्र दिखाई देता है आज मूर्खतावश लोग वासनामय संबंधों को प्रेम कह देते हैं जो कि प्रेम का भी अपमान है।
अपने धारा प्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी को मंत्रमुग्ध व भावविभोर कर दिया । सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा व “श्री गुरु महाराज, “ कामां के कन्हैया”व “लाठी वाले भैय्या” की जय जयकार से गूंज उठा ।
श्री महाराज जी के दर्शनों व दिव्य अमृत वचनों को सुनने के लिए दिनभर भक्तों का ताँता लगा हुआ है ।
