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देश बेचनेवाली नहीं चाहिए सरकार!.. नेपाल के प्रदर्शनकारियों ने भारत की सरकार को भी दिखाया आईना

– चीन परस्त ओली का हुआ तख्तापलट

-भ्रष्ट मंत्रियों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

नेपाल में जेन-जेड प्रदर्शनकारियों का गुस्सा थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। उन्होंने कल ओली सरकार का तख्ता पलट दिया। प्रदर्शनकारी संसद में घुस गए और उन्होंने वहां आग लगा दी। इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि उन्हें देश बेचनेवाली सरकार नहीं चाहिए। माना जा रहा है कि ऐसा कहकर नेपाली प्रदर्शनकारियों ने भारत की सरकार को भी आईना दिखाया है। ज्ञात हो कि यहां भारत में भी केंद्र सरकार सिर्फ एक उद्योगपति के पीछे ही भागती है और देश के सभी प्रमुख संसाधन और इन्प्रâास्ट्रक्चर उसके नियंत्रण में जा रहे हैं। जब विपक्ष इसके खिलाफ आवाज उठाता है तो सरकार आईटी और ईडी जैसी जांच एजेंसियों को विपक्षी नेताओं के पीछे लगा देती है।
बता दें कि नेपाल के प्रधानमंत्री (अब पूर्व) केपी शर्मा ओली का चीन प्रेम जग जाहिर है। हालत यह है कि नेपाल की करेंसी भी चीन में छपती है। इसके अलावा नेपाल की कई बड़ी परियोजनाओं को ओली ने चीनी कंपनियों को सौंप दिया है। ओली के चीनी प्रेम को इसी से समझा जा सकता है कि सरकार ने अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तो बैन लगा दिया, पर चीनी ऐप टिकटॉक बेरोकटोक चलता रहा। इससे नेपाल के युवाओं में पूरी तरह गुस्सा फैल गया और वे सड़कों पर उतर पड़े।
कल प्रदर्शनकारियों ने राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में जमकर उत्पात मचाया। इसी दौरान गुस्साई भीड़ ने वित्त मंत्री विष्णु पौडेल को सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और उन पर लात-घूसे बरसाए। आंदोलन ने सरकार की नींव हिला दी है। पहले गृह मंत्री रमेश लेखक, कृषि मंत्री रामनाथ अधिकारी, स्वास्थ्य मंत्री प्रदीप पौडेल और जल आपूर्ति मंत्री प्रदीप यादव ने इस्तीफा दिया। हालात बिगड़ने के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी पद छोड़ दिया। आखिर में राष्ट्रपति को भी इस्तीफा देना पड़ा।
कई नेताओं ने देश छोड़ा
कल कई नेताओं के देश छोड़ने की भी खबरें आर्इं। इससे साफ है कि जनाक्रोश को दबाना अब नेपाल की पुलिस व सेना के लिए नामुमकिन हो चुका है।
चीन की कठपुतली
प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ओली सरकार चीन के हाथों की कठपुतली बन गई है और वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने की कोशिश कर रही है। ओली की चीन समर्थक नीतियों को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह प्रतिबंध चीन के इशारे पर लगाया गया था? नेपाल में लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाकर सरकार जनता की आवाज को दबाना चाहती है, ताकि उसकी नीतियों और भ्रष्टाचार पर सवाल न उठाए जा सकें।

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