मुख्यपृष्ठस्तंभ‘एक लाइटर की कीमत तुम क्या जानो...!'

‘एक लाइटर की कीमत तुम क्या जानो…!’

ई राज

गाजा वासियों के जीने का सहारा
‘एक लाइटर की इतनी कीमत …!’, ‘अपना लाइटर हमें दे दो और उसके बदले खाने का सामान ले लो’ ‘सुनो बाजार में लाइटर आ गया है किसी भी कीमत पर उसे खरीदना होगा…!’
युद्ध और संकट के दौर में ये सिर्फ एक डायलॉग्स नहीं, बल्कि गाजा के लोगों की जिंदगी और मौत के बीच का कड़वा सच बन चुका है। एक मामूली सा प्लास्टिक का लाइटर, जिसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में नजरअंदाज कर देते हैं, गाजा पट्टी में सर्वाइवल की सबसे बड़ी रीढ़ बन गया है।
अभाव में माचिस और लाइटर की अहमियत
गाजा में जारी संघर्ष, सख्त नाकेबंदी और बुनियादी संसाधनों की भारी कमी के कारण रसोई गैस और बिजली जैसी सुविधाएं पूरी तरह ठप हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में लोगों के पास भोजन पकाने, पानी उबालने और ठंड से बचने के लिए आग जलाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। लकड़ी या कागज इकट्ठा करना एक बात है, लेकिन उसे सुलगाने के लिए आग का जरिया होना पहली शर्त है। माचिस की डिब्बियां नमी के कारण जल्दी खराब हो जाती हैं, जिससे एक छोटा सा लाइटर बहुमूल्य संपत्ति बन जाता है।
आर्थिक और सामाजिक संकट का प्रतीक
जो लाइटर कभी कुछ रुपयों या सेंट्स में आसानी से मिल जाता था, वह अब कालाबाजारी का मुख्य हिस्सा बन चुका है। लोग इसे पाने के लिए भारी कीमतें चुकाने या अपनी जरूरत का अन्य सामान बदलने यानी बार्टर सिस्टम तक को मजबूर हैं। जिसके पास लाइटर है, वह अपने पूरे मोहल्ले या रिफ्यूजी कैंप के लिए एक मददगार की भूमिका निभाता है। एक ही लाइटर की लौ से दर्जनों परिवारों के चूल्हे जलते हैं।
इंसानी जीजीविषा की मिसाल
यह कहानी सिर्फ सामान की किल्लत की नहीं है, बल्कि यह गाजावासियों की अदम्य सहनशीलता और जीने की इच्छा को दर्शाती है। लाइटर का इस्तेमाल अब सिर्फ सिगरेट या मोमबत्ती जलाने तक सीमित नहीं है; यह बच्चों के लिए गर्म पानी, परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी और अंधेरी रातों में उम्मीद की रोशनी का जरिया है।
गाजा में एक लाइटर का रिफिल होना या उसका काम करना किसी की पूरी दिनचर्या का रुख तय कर सकता है। तबाही के मलबे के बीच, यह छोटी सी प्लास्टिक की मशीन यह याद दिलाती है कि जब इंसान से उसकी बुनियादी सुविधाएं छीन ली जाती हैं, तो अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे जीवन का सहारा बन जाती है।

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