मुख्यपृष्ठधर्म विशेषतुलसी ने श्रीगणेश को क्यों दिया था श्राप?

तुलसी ने श्रीगणेश को क्यों दिया था श्राप?

-विवाह प्रस्ताव ठुकराने पर क्रोधित हुईं तुलसी; गणेशजी के प्रतिश्राप से वृक्ष बनने की पौराणिक कथा

-शीतल अवस्थी

भगवान श्रीगणेश को बुद्धि, विवेक और शुभता का देवता माना जाता है। प्रत्येक मांगलिक कार्य में उनकी पूजा सबसे पहले होती है, लेकिन उनकी आराधना में तुलसीदल अर्पित नहीं किया जाता। इसके पीछे ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा बताई जाती है।

कथा के अनुसार, एक बार धर्मात्मज की पुत्री तुलसीदेवी तीर्थयात्रा करते हुए गंगा तट पर पहुंचीं। वहां उन्होंने भगवान श्रीगणेश को ध्यान और तपस्या में लीन देखा। गणेशजी का तेजस्वी स्वरूप देखकर तुलसी उनके प्रति आकर्षित हो गईं। उन्होंने गणेशजी का ध्यान भंग किया और उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।

भगवान श्रीगणेश ब्रह्मचर्य और तपस्या का जीवन व्यतीत करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने विनम्रतापूर्वक तुलसी का विवाह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। साथ ही यह भी कहा कि विवाह मनुष्य को मोह और सांसारिक बंधनों में बांध देता है तथा उनकी वर्तमान साधना के अनुकूल नहीं है।

अपना प्रस्ताव ठुकराए जाने से तुलसी अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने भगवान श्रीगणेश को श्राप दिया कि इच्छा न होने के बावजूद उनके दो विवाह होंगे। इस श्राप को सुनकर गणेशजी ने भी तुलसी को प्रतिश्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा और उसके बाद वे पौधे का स्वरूप धारण कर लेंगी।

गणेशजी का श्राप सुनते ही तुलसी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी और श्राप वापस लेने की प्रार्थना की। तब श्रीगणेश ने कहा कि दिया हुआ श्राप पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन तुलसी पौधे के रूप में संसार में अत्यंत पूजनीय होंगी। भगवान विष्णु को तुलसी विशेष प्रिय होंगी और उनके बिना विष्णु पूजन अधूरा माना जाएगा।

श्रीगणेश ने यह भी कहा कि उनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग स्वीकार नहीं होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार तभी से गणेश पूजन में तुलसीदल चढ़ाना वर्जित माना जाता है। हालांकि गणेश चतुर्थी के कुछ विशेष विधान और क्षेत्रीय परंपराओं में इससे संबंधित अलग मान्यताएं भी मिलती हैं।

तुलसी के श्राप के प्रभाव से श्रीगणेश का विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों—सिद्धि और बुद्धि—से हुआ। परंपरागत मान्यता में उनके पुत्रों को क्षेम और लाभ कहा गया है।

यह कथा मनुष्य को क्रोध में कोई निर्णय न लेने और किसी को कटु वचन या श्राप देने से बचने की सीख देती है। क्षणिक क्रोध संबंधों को बदल सकता है, जबकि संयम और विवेक कठिन परिस्थिति को भी संभाल सकते हैं।

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