पंकज तिवारी
पिछले कई वर्षों से अगल-बगल के गांवों में दुर्गा पूजा पंडाल लगता रहा था। बड़े लोग तो साइकिल, मोटरसाइकिल से निकल जाया करते थे और मां दुर्गा के दर्शन कर आते थे पर बच्चों के मन में हजारों ख्वाहिशें धरी की धरी रह जाती थीं, बेचारे भरसांई में पटपटाते जोन्हरी की भांति छटपटा के रह जाते थे। ललई, भुल्लर, फेंकू, सनेही और परानू उमर में तो बहुत छोटे थे, छोटी कक्षाओं में ही एक साथ पढ़ते थे। अपने गांव में दुर्गा पूजा न लगना इन सभी को बहुत खटकता था। घर से दो किलोमीटर दूर रोज स्कूल जाना और आना पड़ता था। मित्रता बहुत अच्छी हो गई थी आपस में। कुआर महीने की बात है, दुर्गा पूजा की चर्चा गांव-गांव में फिर से शुरू हो गई थी। एक दिन भूंवर गुरुजी कक्षा में पढ़ा रहे थे कि-
‘करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान।’ बहुत ही सुंदर तरीके से व्याख्या भी कर रहे थे। व्याख्या का असर इन पांचों मित्रों पर तो गजब का हो गया था। उत्साह पनप उठा कि प्रयास करने से कुछ भी संभव हो सकता है। शाम को छुट्टी के बाद खेत-खलिहान, मेड़-डांड़, फांदते हुए बच्चे जब धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ रहे थे तो उनके मन में सपनों की एक अलग दुनिया चल रही थी और संयोग की बात देखिए कि पांचों के सपने समान थे। सनेही तो इस कदर खो गया था कि आगे बढ़ते हुए खेतों में खड़े अनाज का ऊपरी सिरा, बालि, हाथ से सुरकता जा रहा था। रास्ते में लोग गाय-भैंस चराते हुए दिख रहे थे कि अचानक से परानू बोल उठा- ‘यार सनेही केहु के खड़ी खेती खराब कइ के का पउबऽ… अरे, कुछ दिमाग लगाव कि यह दांइ अपने गांउ में दुर्गा पूजा लगि जाइ अउर पूरा गांउ जगजगाइ जाइ।’
‘हां रे परनुआ सोचत त हमहूं इहइ हईऽ, मुला दिमकवइ नाइ काम करत बाऽ।’
‘अरे, हम बताई दिमकवा’- फेंकू बोल पड़ा।
‘हां-हां बतावऽ’- सब इकट्ठे होकर खड़े हो गए।
‘अरे… करत करत अभ्यास ते…’ फेंकू गाते हुए तांत वाला झोला अपने चारों ओर घुमाने लगा। सभी झूम उठे। हां यार, कुछ करते हैं। वहीं खेत के मेड़ पर बैठकर पूरा प्लान बनाया गया। घर पहुंचते ही सभी अपने-अपने झोले फेंककर बिना कुछ खाए-पिए गांव के बाहर वाले मंदिर पर इकट्ठे हो गए। पहले तो गांव के सभी छोटे-बड़े बच्चों को इकट्ठा किया गया, पूरा प्लान बाकायदा समझाया गया। बच्चे शोर मचाते पूरे गांव में घूमने लगे और मां दुर्गा के आगमन हेतु लोगों से मदद की गुहार करने लगे। ‘का रे काकी आखिर दुसरे गांउ में जाइ के देबी क दर्शन करथेऽ, कभंउ-कभंउ त काइदे से बइठहू के नाइ मिलत। केतना निक रहत अगर अपने गांउ में देबी माई आइ जातिन तऽ?’
‘हां कहत त सहियइ हयेऽ भइया।’
काकी, अम्मा, भउजी से होते हुए बात बबा, ददा, कका तक पहुंच गई और देखते ही देखते पूरा गांव बच्चों के सपोर्ट में खड़ा हो गया। सौ, दो सौ, पांच सौ, हजार श्रद्धा मुताबिक पइसा भी खूब दिया लोगों ने और साथ ही बड़े लोग भी जुड़ते गए बच्चों के इस मुहिम में। गांव के एकदम किनारे बहुत जगह खाली पड़ी थी। लोग मिल-जुलकर साफ-सफाई किए और जल्दी ही मूर्ति लाने का प्रबंध भी कर लिया गया। सुबह प्लान के मुताबिक लोग पंडाल वाले जगह पर इकट्ठे होने लगे। मघई पांड़े टैक्टर लिए सबसे पहले आ गए थे। कुछ देर बाद जब सभी आ गए, टैक्टर चालू हो गया। धुआं आसमान की ओर फैल गया। ‘जयकारा दुर्गा माई की… जै…’ के साथ लोग मूर्ति लाने चल दिए। बच्चे टैक्टर के पीछे दौड़े पर रोक लिए गए। कुछ देर लोग जाते हुए टैक्टर और लोगों के चेहरे पर उठ रहे अलग-अलग खुशी के भावों को देखते रहे। बाद में अपने-अपने घर की ओर चल दिए। रात के नौ बजे होंगे, लोग फिर इकट्ठे होने लगे। कुछ देर बाद टैक्टर की आवाज धीरे-धीरे पास आती गई। जयकारा वहीं से लगाते हुए लोग आ रहे थे। अंधेरी रात में भी लोग भाग-भाग कर पंडाल के पास आ गए थे। इधर बच्चे कागज, कपड़ा आदि चीजों से पंडाल सजा लिए थे। जयकारों के साथ माता जी को पंडाल में रखा गया। स्थापना अगले दिन होना था।
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
