पंकज तिवारी
झूलन ददा की छोटकी बहिन फगुना अपने भैया मतलब हम सभी के झूलन ददा को खूब मानती थीं, उनके द्वारा कही हर बात को जरूरी आज्ञा समझकर पल भर में निपटा देना तो फगुना का बहुत बड़ा गुण हो गया था। जब छोटे थे तो दोनों में झगड़े भी खूब हुआ करते थे। कोई भी सामान जो घर में आता उसके बंटवारे को लेकर हो-हल्ला जरूर होता था, तमाम ना-नुकुर के बाद हारना तो ददा को ही होता था। घर का काम-काज भी ददा को ही अधिक करना होता था और तो और गोरू-बछरू के लिए कोयेर-कांटा तो खैर ददा के ही नाम था। सबसे जरूरी जो काम था वो था पिसान पिसाना, जिसके हेतु ददा को काफी दूर जाना होता था वो भी सिर पर गेहूं लादकर और ददा को सबसे खराब काम यही लगता था, पर अच्छा लगने न लगने से काम से छुटकारा थोड़े ही मिलना था। रसोइयां में माई जब दोनों की थाली में तरकारी देने के बाद गरमा-गरम रोटी सेंक कर देने लगती थीं तो पता नहीं कितना खा जाने को जी करता था। खैर, यहां भी यदि रोटी सेंकने में थोड़ी देर होती थी तो हार ददा को ही मानना पड़ता था। बेचारे बैठे अपनी बारी का इंतजार करते जो जल्दी आता ही नहीं था। झगड़ा होने पर माई-बाबू भी फगुना की तरफ ही हो जाया करते थे। घर में सबसे छोटी होने का खूब फायदा उठाती थी फगुना। माई तो अक्सर उसे घर के कामकाज करने हेतु उलाहने भी दे देती थी कि ‘कुछ काम-धाम त सीखत नाइ बाटू, ससुरे में खाना का तोहंइ बइठेन-बइठे मिले काऽ? दमाद राम खेदि देइहीं तोहंइ…’ पर बाबू थे कि बिल्कुल पलकों पर सजाकर रखते थे अपनी बिटिया को, हमेशा कंधे पर बिठाए घूमते थे नन्हीं सी गुड़िया को। मानते तो खैर ददा भी खूब थे, पर जैसा अक्सर होता है कि एक ही घर में जोड़ी-समउरी अगर दो बच्चे हैं तो तकरार होनी ही है। बस यही तकरार हमेशा होती थी दोनों में।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और फगुना बड़ी होती गई। दो चोटी बांधने की बला से बचकर फगुना अब बला की खूबसूरत हो गई थी। चंचलता समय के साथ धीरे-धीरे फुर्र होने लगी और गंभीरता के साये में फगुना सिमटती चली गई थी। अब घर के बाहर भी जल्दी कोई नहीं देख पाता था उसे। बरतन मांजने के लिए बाहर घूर पर जाना होता था पर फगुना भोर होते ही, अंधियारे मुंहे कब अपना काम निपटा आती थीं कोई जान भी नहीं पाता था। साफ-सफाई का भी खूब ध्यान रखती थीं फगुना।
जल्दी ही दबे जुबान में ही सही पर फगुना के बियाह की चर्चा गांव-घर में होने लगी थी। ददा जो अभी ददा के पदवी तक नहीं पहुंचे थे, जिनका अभी बियाह होना शेष था, पर जैसा कि गांवों में आम है कि भले ही बेटा कुछ साल बड़ा हो और बेटी छोटी पर बियाह पहले बेटी का ही निपटाना होता है। गांवों में बियाह होने को बियाह निपटाना ही कहा जाता है। ददा के बाप राम, मतलब अघोरी प्रसाद बेचारे अब सफेद धोती-कुर्ता पर टीनों पॉल लगाकर, कान्हे पर गमछा धरे साइकिल लेकर और गांव के एक-दो समझदार और संपन्न आदमी को लिए देखुआरी पर निकलने लगे थे। फगुना जब सुनती कि ददा देखुआरी में जा रहे हैं बेचारी शरमा जाती थी, घर से बाहर ही नहीं निकलती थी, लजा कर सिमट जाती थी पर मन ही मन भगवान शंकर से मनाती भी थी कि हे भगवान जल्दी से किसी अच्छे परिवार को मिला दीजिए हमरे बाबू से, ताकि बहुत ज्यादा परेशान ना होना पड़े बाबू को। माई बेचारी तो दिन भर परेशान रहा करती थी कि ‘पता नाइ कइसन घर, बर, मिले हमरे बिटिया के। ओकरे लायक लड़िका मिलबउ करे कि नाइ…’ जैसे पता नहीं कितने प्रश्नों में उलझी रहती थीं माई। बाबू अक्सर निराश होकर ही लौटते थे। कहीं लड़का छोटा है, तो कहीं अनपढ़, तो कहीं नशेड़ी लड़के की बात सुन बेचारे निराश हो चुके थे। माई… बाबू को देखते ही दौड़ पड़ती थीं कि क्या खबर है? पर पास पहुंचते ही बाबू का लटका हुआ चेहरा देखकर निराश हो जाती थीं। ‘हमरे लक्ष्मी बदे केउ न केउ बिष्णू जरूर होएऽ बस हमइ सबके अबइ देखात नाइ हयेन, ओइसइउ एतना जल्दी कहां मिलथेन भगवान…’ बाबू को सांत्वना देते हुए अगली बार सब बढ़िया होगा, कह उठती थीं माई।
बाबू बस मुस्कुरा कर रह जाते थे। क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
