राजन पारकर / मुंबई
मुंबई महानगर की ट्रैफिक, धुआं, हॉर्न और अव्यवस्था के बीच महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में ‘बाइक टैक्सी सेवा’ की एक नई नीति घोषित की। राज्य परिवहन प्राधिकरण ने ओला, उबर और रैपिडो जैसी ऐप-आधारित कंपनियों को ‘अस्थायी परमिट’ देने की मंजूरी दी है। पहले १.५ किमी का किराया १५ रुपए और उसके बाद प्रति किमी १०.२७ रुपए तय किया गया है। सरकारी अधिकारी गर्व से बताते हैं, ‘किराया उचित है। लेकिन मुंबईकर पूछ रहे हैं, ‘यह हिसाब किस जादुई वैâलकुलेटर से निकाला गया?’
निजी बाइक, ऐप और नियमों का सरकारी चक्रव्यूह कुछ वर्ष पहले सरकार के ही आदेश में साफ लिखा था, ‘निजी दोपहिया वाहन का व्यावसायिक यात्री परिवहन में उपयोग प्रतिबंधित है।’ लेकिन अब सरकार अचानक कहती है, ‘हमने ऐप-आधारित बाइक टैक्सी के लिए अस्थायी अनुमतियां दी हैं।’ अस्थायी का अर्थ, ‘हां भी, नहीं भी और पैâसला बाद में।’ रैपिडो का नया फॉर्मूला, ‘बाइक टैक्सी बंद, लेकिन बाइक पार्सल शुरू।’ कानूनी दबाव बढ़ते ही रैपिडो ने एक चमत्कारिक घोषणा की, ‘हमने बाइक टैक्सी सेवाएं बंद कर दी हैं, पर अब हम ‘बाइक पार्सल’ सेवा चला रहे हैं।’ यानी यात्री बैठा तो अवैध, बॉक्स बैठा तो वैध! मुंबईकरों का तंज, ‘सरकार को इंसान मंजूर नहीं, पर डिब्बा मंजूर है?’ कंपनियां कहती हैं, ‘हम नियमों का पालन कर रहे हैं।’ पुलिस कहती है, ‘कुछ वाहन अवैध हैं।’ आरटीओ कहता है, ‘जांच चालू है’ और रोज संघर्ष झेलने वाला मुंबईकर कहता है, ‘कानूनी–गैरकानूनी बाद में, पहले हेलमेट तो मिल जाए!’ महाराष्ट्र की बाइक टैक्सी सेवा कानूनी है या आधी–अधूरी? नीति स्पष्ट है या ‘अस्थायी’ धुंध में लिपटी हुई? इन सवालों का कोई ठोस जवाब अब तक सामने नहीं है। जनता किसे माने?
सरकार कहती है, ‘सेवा कानूनी है।’ कंपनियां कहती हैं, ‘हम नियमों का पालन कर रहे हैं।’ पुलिस कहती है, ‘उल्लंघन जारी है।’ जनता कहती है, ‘हम रोज सड़कों पर सच्चाई देखते हैं और सच्चाई यह है कि बाइक टैक्सी से ज्यादा, नियमों का तमाशा तेजीr से दौड़ रहा है!’
