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दहेज की आग में हर दिन जल रहीं १६ बेटियां! …यूपी-बिहार में सबसे भयावह हालात

भोपाल की ट्विशा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर, ग्वालियर की पलक रजक और कर्नाटक की ऐश्वर्या के नाम इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन लड़कियों की मौत ने एक बार फिर दहेज हत्या और घरेलू हिंसा और उत्पीड़न को बहस का मुद्दा बना दिया है। हालांकि हमारे देश में न तो दहेज की प्रथा नई है और न ही इसके नाम पर होने वाली मौतें या हत्याएं। हालांकि, भारत में १९६१ से दहेज प्रथा अवैध है, लेकिन आज भी इस कुरीति के चलते सालाना हजारों लड़कियां अपनी जान गंवा रही हैं। अखबार की सुर्खियों के अलावा नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं। एनसीआरबी की हालिया जारी रिपोर्ट बताती है कि देशभर में साल २०२४ में दहेज ने करीब ५,७३७ जानें ली हैं, यानी हर दिन औसतन १५ से १६ मौतें।
यह डेटा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के दिए गए आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा ८० और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा ३०४बी, दोनों के तहत दर्ज मामले शामिल हैं। राज्यवार डेटा देखें, तो २०२४ में दहेज प्रताड़ना के कारण उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा २,०३८ मौतें हुई हैं। दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां १,०७८ ऐसे मामले सामने आए। साथ ही, इन राज्यों में दहेज से होने वाली मौतों की दर भी सबसे ज्यादा रही। इनके बाद तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां ४५० मौत के मामले सामने आए हैं। वहीं चौथे नंबर पर राजस्थान में ३८६ मौतें दर्ज की गई हैं।
कई मामले पुलिस
तक नहीं पहुंच पाते
यह तो सरकारी आंकड़े हैं। लेकिन महिला संगठनों और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग अक्सर ये दावा करते हैं कि कई मामले तो पुलिस के पास तक नहीं पहुंचते। महिला की मौत के बाद समाज के दबाव में दोनों पक्षों के बीच अदालत से बाहर ही समझौता हो जाता है। अगर उन मामलों को ध्यान में रखा जाए तो यह संख्या दोगुनी हो सकती है।

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