राधेश्याम सिंह | पालघर
एक ओर जहां केंद्र और राज्य सरकारें “डिजिटल इंडिया” और “विकसित भारत” के सपने को साकार करने के दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के पालघर जिले के विक्रमगढ़ तालुका स्थित म्हसे गांव की स्थिति इन दावों को कठघरे में खड़ा कर रही है। यहां के मासूम बच्चे हर दिन जान हथेली पर रखकर शिक्षा हासिल करने निकलते हैं।
म्हसे गांव के बच्चों को निकटवर्ती वाकी गांव के स्कूल में पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है, लेकिन दो गांवों के बीच बहने वाली पिंजाळ नदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। पुल के अभाव में बच्चे टायर की ट्यूब के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं। यह जोखिम भरा सफर मानसून के दिनों में और भी खतरनाक हो जाता है, जब नदी उफान पर होती है।
बच्चों के साथ-साथ कई बार माता-पिता भी इस खतरनाक सफर में उनका साथ देते हैं ताकि किसी अनहोनी से बचा जा सके। एक हाथ में किताबों का बस्ता, तो दूसरे हाथ में टायर ट्यूब, बच्चों की यह तस्वीर हमारे “विकसित राष्ट्र” की जमीनी सच्चाई बयां करती है।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि कई बार प्रशासन से पक्के पुल की मांग की गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। वर्षों से यह मांग कागजों में दबकर रह गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस खतरनाक सफर में किसी बच्चे की जान चली जाती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति न सिर्फ सरकारी असंवेदनशीलता को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या महाराष्ट्र सरकार और जिला प्रशासन के लिए एक छोटा सा पुल बनाना इतना मुश्किल कार्य है, कि उसकी अनुपस्थिति में नन्हे बच्चों को जान की बाज़ी लगाकर स्कूल जाना पड़े?
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस मुद्दे का तत्काल संज्ञान लें और म्हसे गांव से वाकी स्कूल तक स्थायी और सुरक्षित पुल का निर्माण शीघ्र करवाएं। यह सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं होगा, बल्कि नन्हें भविष्य की रक्षा और शिक्षा के अधिकार की सुनिश्चितता की दिशा में एक संवेदनशील कदम होगा।
शिक्षा की तरफ बढ़ते इन मासूम कदमों को अब और बाधाओं से न गुजरना पड़े – यह सुनिश्चित करना सरकार और समाज की संयुक्त ज़िम्मेदारी है।
