अजीब सा मौन सा छाया है
और पहाड़ भी चुप है
मगर अंदर उनके
कुछ टूटन सी है।
अवनि भी है डगमग
अंतर पीड़ा से,
उद्वेलित होती है जब
तब बाहर आता आक्रोश,
जला देता है दरख्त
जैसे हरे सपनों में
लगी आग हो।
धूं-धूं कर जलते जंगल
मानो रो रहे हो,
धुएं में घुली हैं सदियों की कहानियां।
सूनी हैं बस्तियां,
जहां गूंजती थीं हंसी बच्चों की
बचपने की किलकारियां,
चीखें बिखरी हैं अब वहां
चारों तरह है अफरा-तफरी।
लगता है असभ्यता के कोलाहल में
गुम है मानवता,
जो खुद को ढूंढ रही है।
लोगों की भारी भीड़ है
पर लगता मनुष्य कम हैं।
चेहरों पर डर नहीं आदत है अब।
जो जीता है प्रकृति से परे हटकर
वे इंसान कम भीतर से उजाड़ होते हैं।
ऐसे समय में शायद एकांत ही उपयुक्त है,
जो अनुभूत कराता सच
बोलता बिल्कुल नहीं है
बिना शोर के, बिना दिखावे के।
जहां है एकांत…
वहां न संवेदनाएं जलती हैं
न धरती डगमगाती है,
और सुकून पाता है चंचल मन…
करता है थोड़ी देर को ही सही,
मनुष्य होने का अभ्यास
सचमुच बड़ा कठिन है
खुद को खुद में पहचानना…।
-अमृतलाल मारू ‘रवि’
इंदौर, म.प्र.
