मेरे भाव

उम्र ७५ की हो गई पर
सबको हंसना हंसाना
है,
भूले से भी जाल में
अपने
नहीं किसीको फंसाना
है।
आप सभी को देख
यहां पर
पांचों पाण्डव धन्य हुए,
आप जैसे श्रोता
बताओ
कहीं कहां पर अन्य
हुए ?
वामा की मेरी सब
सखियां
अच्छा खासा लिखती
हैं,
धरती की तो बात ही
छोड़ो
दूर क्षितिज तक
दिखती हैं।
प्रवाह देता है विचार
को
उन्नयन में है भाषा,
संघ लेखिकाओं का
जो है
उससे बहुत सी है
आशा।
नर्मदांचल से जो आए
कल-कल बहती मां
रेवा,
विन्ध्य सतपुड़ा हैं दो
भाई
सभी किनारों पर सेवा।
पूरे म.प्र. में फैला
ऐसा लेखक संघ है,
विविध विधा के
आयोजन से
सारे श्रोता दंग हैं ।
सबको हिन्दी में
समझाता
वो हिन्दी परिवार है,
वाजपेयी जी के कंधों
पर ही
उसका सारा भार है।
वाजपेयी जी की और
मेरी तो
भूले से भी न बनती,
कौतुकजी समझाने
आते
कैप लगाएं मोहंती।
अच्छा संचालन जो
करते
कोई बताए उनका नाम
लंका का रावण भी
कहता
मेरे दुश्मन हैं ये राम।
एक प्रभू ऊपर हैं
विराजे
अच्छे लिखते हैं दोहे
रोज सराफा खाने जाते
सिर्फ जलेबी ओर पोहे।
दिन भर माला जपते
रहते
वे ही सत्य हैं नारायण,
राकेश शर्मा रोज शाम
को
वीणा का करते
पारायण।
एक समिति है हिन्दी
की
कालजयी साहित्य है,
चन्द्रमां से चर्चा करता
रोज वहां आदित्य है।
सुस्वादु भोजन कर
कर के
सबके फूले गाल हैं,
मिलनसार,हरदम जो
हाजिर
वे ही पालीवाल हैं।
जिनने छापी है
स्मारिका
वे ही खरे-अवस्थी हैं,
दोनों के ही प्रकाशनों
की
अच्छी खासी बस्ती है।
मखs निमाड़ी आवता
नी हंई
कैत्री मीठी बोली छै,
संजा फूली गणगौर की
सभी उठावां डोली छै।
आज की आशू कविता
का तो
यहीं पे पूर्ण विराम है,
दाढी वाले एक कवि
का
सबको लाखों प्रणाम
है।

प्रदीप नवीन इन्दौर

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