राधेश्याम सिंह | पालघर
पालघर ज़िले के वाडा तालुका के नाकडपाडा गांव से एक बेहद चौंकाने और चिंताजनक स्थिति सामने आई है, जहां गारगांव स्थित आश्रम स्कूल में पढ़ने वाले दर्जनों छात्र और छात्राएं रोज़ाना अपनी जान जोखिम में डालकर तेज़ बहाव वाली नदी पार करके स्कूल जाने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी संवेदनहीनता पर भी गहरे सवाल खड़े करती है।
गारगांव स्थित आश्रम स्कूल और नाकडपाडा गांव के बीच की दूरी कुछ ही किलोमीटर है। लेकिन इसी “निकटता” के चलते इन छात्रों को स्कूल हॉस्टल में रहने की अनुमति नहीं दी जाती। आश्रम स्कूलों के नियमों के अनुसार, निकटवर्ती गांवों से आने वाले बच्चों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, भले ही प्राकृतिक परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों।
छात्रों को स्कूल पहुंचने के लिए एक तेज़ बहाव वाली नदी पार करनी पड़ती है, जिस पर केवल एक अस्थायी और बेहद असुरक्षित बांध बना है। बारिश के मौसम में यह रास्ता फिसलन भरा और जानलेवा बन जाता है। बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के बच्चे इस बाधा को पार करने को विवश हैं।
हालांकि एक वैकल्पिक रास्ता मौजूद है, लेकिन वह 5 से 6 किलोमीटर लंबा है। गरीब परिवारों के ये बच्चे पैदल उस दूरी को तय नहीं कर पाते और समय की कमी के कारण वे खतरनाक नदी पार करने वाला मार्ग ही चुनते हैं।
नाकडपाडा के ग्रामीण और छात्र अभिभावक लगातार प्रशासन से इस समस्या के समाधान की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि या तो अस्थायी बांध को मजबूत और ऊंचा किया जाए या फिर एक स्थायी पुल का निर्माण कराया जाए, जिससे बच्चों के साथ-साथ अन्य ग्रामीणों की आवाजाही भी सुरक्षित हो सके।
साथ ही अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रशासन को नियमों में लचीलापन दिखाते हुए बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और उन्हें हॉस्टल की सुविधा प्रदान करनी चाहिए।
नाकडपाडा गांव की यह स्थिति अब केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि यह शिक्षा के अधिकार और बच्चों की बुनियादी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन और शिक्षा विभाग किसी हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं?
