सैयद सलमान मुंबई
भारत में वक्फ संस्था मुस्लिम समाज की ऐतिहासिक धरोहर रही है, जो सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का एक मजबूत आधार मानी जाती है। वक्फ संपत्तियों का मूल उद्देश्य हमेशा से समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और कल्याण के क्षेत्र में सहयोग देना रहा है। लेकिन वर्तमान में वक्फ बोर्ड की भूमिका, उसकी कार्यशैली और उस पर बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर मुस्लिम समुदाय में गहरी चिंता और असंतोष देखा जा सकता है। वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और उनके सही उपयोग को लेकर समाज के भीतर सवाल उठ रहे हैं, जिनका समाधान आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
जागरूकता
मुफ्ती मंजूर जियाई की पुस्तक ‘वक्फ: शरीयत, सियासत और इसलाहात – हिंदुस्तानी तनाजर में’ इस विषय पर गहराई से प्रकाश डालती है। जियाई ने वक्फ के ऐतिहासिक, कानूनी और सामाजिक पहलुओं के साथ-साथ वक्फ बोर्ड की कमजोरियों, राजनीतिक हस्तक्षेप और २०२४ के वक्फ अधिनियम में हुए सुधारों का विश्लेषण किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि वक्फ को केवल ‘मुफ्त जमीन’ या ‘आमदनी का स्रोत’ समझना उसकी असल अहमियत को कम करना है। वे आगाह करते हैं कि वक्फ बोर्ड की निष्क्रियता, पारदर्शिता की कमी और राजनीतिक संरक्षण के कारण वक्फ संपत्तियां या तो बेकार पड़ी हैं या अवैध कब्जों की भेंट चढ़ गई हैं। जियाई ने वक्फ जागरूकता अभियान जैसी पहलों की वकालत की है, जिससे समाज में वक्फ के महत्व, संरक्षण और सही इस्तेमाल को लेकर चेतना विकसित हो सके।
जियाई ने अपनी पुस्तक में कई अनछुए पहलुओं को गंभीरता से उठाया है। आज देश में वक्फ बोर्ड तीसरे नंबर की सबसे बड़ी जमीन रखनेवाली संस्था है, जिसका मूल उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए काम करना था, लेकिन मुसलमानों के भीतर यह धारणा बन गई है कि बोर्ड की निष्क्रियता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण के कारण वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग और अवैध कब्जे बढ़े हैं। कई मुस्लिम संगठनों ने सवाल उठाया है कि वक्फ बोर्ड ने गरीब मुसलमानों के लिए क्या ठोस योगदान दिया है, कितनों को शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास की सुविधा मिली है और कितनी बच्चियों की शादी में मदद की गई है? जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी बताती है कि वक्फ बोर्डों द्वारा अर्जित राजस्व, उनकी संपत्तियों की तुलना में बेहद कम है। यदि इन संपत्तियों का सही प्रबंधन हो तो यह मुस्लिम समाज के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव बन सकती हैं।
सरकारी दखल
वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता और अधिकारों को लेकर सियासत भी लगातार गर्म रही है। भाजपा ने वक्फ बोर्ड की कथित अनियमितताओं को मुद्दा बनाकर अन्य समुदायों में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश की, जबकि विपक्षी दलों के शासनवाले राज्यों में वक्फ संपत्तियों के विवादों ने राजनीतिक माहौल को और पेचीदा बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट में भी यह सवाल उठा कि जब हिंदू धार्मिक बोर्ड में गैर-हिंदू सदस्य नहीं होते तो वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्य क्यों? २०२४ और २०२५ के वक्फ संशोधन विधेयकों ने बहस को और तीखा कर दिया है। सरकार का दावा है कि इन संशोधनों से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता आएगी, विवादों का समाधान तेज होगा और संपत्तियों का लाभ वंचित मुसलमानों तक पहुंचेगा। डिजिटल रजिस्ट्री, जियो-टैगिंग, बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति और विवाद समाधान के अधिकार जिला प्रशासन को देने जैसे प्रावधान लाए गए हैं। हालांकि, मुस्लिम संगठनों का एक बड़ा वर्ग इसे धार्मिक मामलों में सरकारी दखल मानता है और वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता में कटौती के रूप में देखता है। मुसलमानों के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि वक्फ संपत्तियों का वास्तविक लाभ आखिरकार किसे मिल रहा है?
सजग होना जरूरी
इस विषय पर समाधान के लिए सरकार और समाज दोनों को आत्मचिंतन करना होगा। वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और पारदर्शी प्रबंधन के लिए कानूनी सुधार जरूरी हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है ईमानदार नेतृत्व, जवाबदेही और सामूहिक जिम्मेदारी। वक्फ बोर्ड में समावेशिता, पारदर्शिता और पेशेवर दक्षता अनिवार्य है। सरकार को वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि वक्फ संपत्तियों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। मुस्लिम समाज को भी अपनी भूमिका को लेकर सजग होना होगा। केवल विरोध या चिंता जताने से समाधान नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, पारदर्शी प्रबंधन और सही उपयोग के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। वक्फ को केवल धार्मिक संपत्ति न मानकर, उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक कल्याण का माध्यम बनाना होगा।
दरअसल, वक्फ को उसकी असली गरिमा और उद्देश्य के साथ पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, ताकि यह संस्था आनेवाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, समृद्धि और सम्मान का स्रोत बन सके। वक्फ की पुनर्स्थापना, पारदर्शिता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ ही संभव है। यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
