मुख्यपृष्ठस्तंभउड़ता तीर : कठघरे में बाबा और महंत!

उड़ता तीर : कठघरे में बाबा और महंत!

प्रमोद भार्गव

धार्मिक उत्सवों में दुर्घटनाओं का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। प्रयागराज कुंभ मेले में इसी साल जून माह में बंगलुरु में आईपीएल मैच और हाल ही में भगवान जगन्नाथ रथयात्रा के चलते पुरी में मची भगदड़ की स्मृतियां विलोपित भी नहीं हो पार्इं थीं कि बागेश्वर धाम छतरपुर में कथावाचक पंडित धीरेंद्र शास्त्री के जन्मोत्सव मनाने के लिए दूरदराज से आए श्रद्धालुओं पर टेंट गिर जाने से एक व्यक्ति की मौत हो गई और अनेक घायल हो गए। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के रावतपुरा सरकार के महंत रविशंकर महाराज विरुद्ध चिकित्सा महाविद्यालय की मान्यता के लिए रिश्वत देने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है। इनके साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों सहित ३५ लोगों पर सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया है। इस प्रकरण में नवा रायपुर स्थित श्री रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिचर्स की मान्यता के लिए रिश्वत दिए जाने का राजफाश सीबीआई ने किया है। यह मामला एक करोड़ ६२ लाख की रिश्वत के लेन-देन से जुड़ा है। मामले में संस्था के अनेक पदाधिकारियों को सीबीआई ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है। रविशंकर महाराज इस संस्था के अध्यक्ष हैं। साफ है न तो किसी संत के पास कोई ऐसी दैवीय शक्ति है कि वह घटना का पूर्वानुमान लगा लें और न वे स्वयं लोभ लालच से मुक्त हो पाए हैं। वे केवल बाहरी आडंबर से ढके हुए हैं। दुनिया की किस्मत बांचने व बता देनेवाले रविशंकर महाराज और धीरेंद्र शास्त्री इसके ताजा उदाहरण हैं।
लापरवाह शासन-प्रशासन
भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही है। जिसके चलते दर्शन-लाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाली भगदड़ व आगजनी का सिलसिला हर साल इस तरह के धार्मिक मेलों में देखने को मिल रहा है। साफ है, प्रत्येक कुंभ में जानलेवा घटनाएं घटती रहने के बावजूद शासन-प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें। किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती, अतएव उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अक्सर देखने में नहीं आती। लिहाजा, आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेश बेकाबू ही नहीं हुए होते। अतएव देखने में आता है कि आयोजन को सफल बनाने में जुटे अधिकारी भीड़ के मनोविज्ञान का आकलन करने में चूकते दिखाई देते हैं।
रथयात्रा की तैयारियों के लिए कई हजार करोड़ की धनराशि खर्च की जाती है। जरूरत से ज्यादा प्रचार करके लोगों को यात्रा के लिए प्रेरित किया जाता है। फलत: जनसैलाब इतनी बड़ी संख्या में उमड़ गया कि सारे रास्ते पैदल भीड़ से जाम हो गए। इसी बीच लापरवाही यह रही कि बाहर जाने के रास्ते को नेता और नौकरशाहों के लिए आरक्षित कर दिया गया और पूजा सामग्री से भरे दो ट्रक आम रास्ते से मंदिर की ओर भेज दिए। इस चूक ने घटना को अंजाम दे दिया। जो भी प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकी उपाय किए गए थे, वे सब व्यर्थ साबित हुए। क्योंकि उन पर जो घटना के भयावह दृश्य दिखाई देने लगे थे, उनसे निपटने का तात्कालिक कोई उपाय ही संभव नहीं रह गया था। ऐसी लापरवाही और बदइंतजामी सामने आना चकित करती है। दरअसल, रथयात्रा में जो भीड़ उमड़ी थी, उसके अवागमन के प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौशल की जरूरत थी, उसके प्रति घटना से पूर्व सर्तकता बरतने की जरूरत थी? इसके प्रति प्रबंधन अदूरदर्शी रहा। मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रशिक्षण से लेते हैं, जो भारतीय मेलों के परिप्रेक्ष्य में कतई प्रासंगिक नहीं है। क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देश में किसी एक दिन और विशेष मुहूर्त के समय लाखों-करोड़ों की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जाती? बावजूद हमारे नौकरशाह भीड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण, लेने खासतौर से यूरोपीय देशों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रशिक्षण विदेशी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देशज ज्ञान और अनुभव से लिखने होंगे।
अंधविश्वास
प्रशासन के साथ हमारे राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी सितारे और आला अधिकारी भी धार्मिक लाभ लेने की होड़ में व्यवस्था को भंग करने का काम करते हैं। इनकी वीआईपी व्यवस्था और यज्ञ कुंड अथवा मंदिरों में मूर्तिस्थल तक ही हर हाल में पहुंचने की रूढ़ मनोदशा, मौजूदा प्रबंधन को लाचार बनाने का काम करती है, जो ज्यादातर दुर्घटनाओं में देखने में आती है। दरअसल, दर्शन-लाभ और पूजापाठ जैसे अनुष्ठान अशक्त और अपंग मनुष्य की वैशाखी हैं।
जब इंसान सत्य और ईश्वर की खोज करते-करते थक जाता है और किसी परिणाम पर भी नहीं पहुंचता है तो वह पूजापाठों के प्रतीक गढ़कर उसी को सत्य या ईश्वर मानने लगता है। यह मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। यथार्थवाद से पलायन अंधविश्वास की जड़ता उत्पन्न करता है। भारतीय समाज में यह कमजोरी बहुत व्यापक और दीर्घकालीक रही है। जब चिंतन-मनन की धारा सूख जाती है तो सत्य की खोज मूर्ति पूजा और मुहूर्त की शुभ घड़ियों में सिमट जाती है। जब अध्ययन के बाद मौलिक चिंतन का मन-मष्तिस्क में ह्रास हो जाता है तो मानव समुदाय भजन-कीर्तन में लग जाता है। यही हश्र हमारे पथ-प्रदर्शकों का हो गया है। नतीजतन पिछले कुछ समय से सबसे ज्यादा मौतें भगदड़ की घटनाओं और सड़क दुर्घटनाओं में उन श्रद्धालुओं की हो रही हैं, जो ईश्वर से खुशहाल जीवन की प्रार्थना करने धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं।
मीडिया इसी पूजा-पाठ का नाट्य रूपांतरण करके दिखाता है, यह अलौकिक कलावाद, धार्मिक आस्था के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविश्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईश्वरीय अथवा भाग्य आधारित अवधारणा को भाग्य और प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं।
दरअसल मीडिया, राजनेता और बुद्धिजीवियों का काम लोगों को जागरूक बनाने का है, लेकिन निजी लाभ का लालची मीडिया, लोगों को धर्मभीरू बना रहा है। राजनेता और धर्म की आंतरिक आध्यात्मिकता से अज्ञान बुद्धिजीवी भी धर्म के छद्म का शिकार होते दिखाई देते हैं। यही वजह है कि पिछले दो दशक के भीतर मंदिर हादसों में लगभग ५,००० से भी ज्यादा भक्त मारे जा चुके हैं। बावजूद श्रद्धालु हैं कि दर्शन, आस्था, पूजा और भक्ति से यह अर्थ निकालने में लगे हैं कि इनको संपन्न करने से इस जन्म में किए पाप धुल जाएंगे, मोक्ष मिल जाएगा और परलोक भी सुधर जाएगा। गोया, पुनर्जन्म हुआ भी तो श्रेष्ठ वर्ण में होने के साथ आर्थिक रूप से समृद्ध व वैभवशाली होगा। परंतु इस तरह के खोखले दावों का दांव हर मेले में ताश के पत्तों की तरह बिखरता दिखाई दे रहा है और हमारे संत- महंत आर्थिक धोखाधड़ी व स्त्री दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों की गिरफ्त में आ रहे हैं।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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