मुख्यपृष्ठस्तंभऋतुचक्र : कजरी - कुछु न सुझात बा न

ऋतुचक्र : कजरी – कुछु न सुझात बा न

सुरेश मिश्र

आज उत्तराखंड और हिमाचल में पहाड़ लड़खड़ाकर दरक रहे हैं, गिर रहे हैं। किसी ने पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है तो हमेशा सीना तानकर खड़ा रहनेवाला पहाड़ फूट-फूटकर रोने लगा-
भसकि-भसकि के पहाड़ गिरल जात बा
कुछु न सुझात बा न।
मनई के बदलि ग रंग,
रोज खोदेला सुरंग,
यहिं उमंग मा विहंग उजरि जात बा
कुछु ना सुझात बा न।
सीना ताने जे पहाड़,
रहि न पावइं आजु ठाढ़,
बाढ़ देखि के असाढ़ मुस्कियात बा
कुछु ना सुझात बा न।
काटि-काटि के पहाड़ी,
घुसल जात बाटइ गाड़ी,
गर्भगृह मा गाड़ी देखा मनमनात बा
कुछु ना सुझात बा न।
पुल, सड़क अउ कारखाना,
बांध बनत हउवे नाना,
धीरे-धीरे सगरा पेड़ कटल जात बा
कुछु ना सुझात बा न।
मुख से निसरे नाहीं बानी,
चारि धाम कइ कहानी,
फूटि-फूटि रोवइं, छाती फटल जात बा
कुछु न सुझात बा न।
कइके हमरा सत्यानाश,
लोग बोलेला बिकास,
प्यास मनइन कऽ रोज बढ़ल जात बा
कुछु ना सुझात बा न।
जेकरा पे रहल हो नाज,
मुड़वा पीटइं अब गिरिराज,
ताज देसवा क आजु दरकि जात बा
कुछु ना सुझात बा न।
केउ क दिहे बिना त्रास,
करा प्रगति अउ विकास,
नाहीं हमरा क प्रलय ही देखात बा
कुछु ना सुझात बा न।

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