प्रो. दयानंद तिवारी
(राज्य अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती, महाराष्ट्र)
`जो पड़ गए रण में, उन्हें रण में ही रहना चाहिए।
जीवन मिले या मृत्यु, रण-धर्म नित्य निभाना चाहिए।’
यही वो स्वर है, जो सोहनलाल द्विवेदी को स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली काव्यनायकों की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
सोहनलाल द्विवेदी का जन्म २२ फरवरी १९०६ को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के फतेहपुर गांव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनके भीतर देशभक्ति और साहित्य के बीज अंकुरित होने लगे थे। उन्होंने हिंदी और संस्कृत में गहन अध्ययन किया तथा राष्ट्रवादी आंदोलनों से प्रेरणा ली।
उनकी शिक्षा-दीक्षा लखनऊ और प्रयाग (अब प्रयागराज) में हुई। विद्यार्थी जीवन में ही उनका झुकाव महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता संग्राम की ओर हो गया। उनका जीवन संयम, अनुशासन, और गांधीवादी आदर्शों से ओत-प्रोत रहा।
काव्य-धारा : राष्ट्रवाद और जनचेतना
सोहनलाल द्विवेदी की रचनाएं मूलत: राष्ट्रवादी चेतना, गांधीवाद, जनजागरण और बलिदान की भावना से सराबोर हैं। उन्होंने कविता को केवल कलात्मकता की अभिव्यक्ति नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण का शस्त्र बनाया। उनकी कविता जनमानस को आंदोलित करती थी, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी रचनाएं हजारों युवाओं को देश के लिए प्रेरित करती थीं।
उनका स्वर न तो चापलूस था, न निराशावादी-बल्कि आक्रोश, आशा, आत्मबल और संकल्प का स्वर था।
प्रमुख काव्यसंग्रह और रचनाएं
`भू पर स्वर्ग उतारेंगे’, जय हिंद’, चलो भारत’, विजय पताका’
वंदे मातरम’ (गीत संग्रह) मंगल प्रभात’ आदि।
इन काव्यसंग्रहों में राष्ट्र के प्रति प्रेम, मातृभूमि के लिए बलिदान और गांधीजी के विचारों की महक साफ महसूस की जा सकती है।
गांधीजी से निकट संबंध
सोहनलाल द्विवेदी को महात्मा गांधी के अत्यंत निकट माना जाता था। उनकी कविताओं में गांधीजी के विचारों का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने गांधी जी को `युगपुरुष’ और `मानवता का प्रतिनिधि’ माना। उनकी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां-
`चल पड़े जिधर दो डगमग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर।’
गांधी के नेतृत्व की प्रभावशीलता का अद्भुत चित्रण करती है। इस कविता ने स्वतंत्रता संग्राम में लाखों युवाओं के मन में प्रेरणा का संचार किया।
शैली और भाषा
सोहनलाल द्विवेदी की भाषा सरल, ओजस्वी और प्रभावशाली थी। उन्होंने काव्यशास्त्रीय बंधनों से स्वयं को मुक्त रखते हुए कविता को जनकंठ बनाया। उनकी रचनाएं वीर रस, राष्ट्र रस और करुण रस की त्रिवेणी हैं। उनका काव्य पाठ्यपुस्तकों में स्थान पा गया और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक मंचों और आंदोलनों का स्वर बन गया।
वे कवियों की उस परंपरा से थे जो कविता को आंदोलनों का स्वर बनाते हैं, न कि केवल पुरस्कारों का माध्यम।
राष्ट्रीय चेतना का कवि
उनकी कविताएं युद्ध, शांति, बलिदान, और सेवा जैसे राष्ट्रधर्म के मूल्यों की प्रतिष्ठा करती हैं। उनके द्वारा रचित ‘विजय पताका’, ‘चलो भारत’, ‘जय हिंद’ जैसी रचनाएं आज भी स्कूलों, रैलियों और सार्वजनिक समारोहों में गूंजती हैं।
उनकी रचनाओं ने यह प्रमाणित किया कि कविता केवल मंच पर गूंजने के लिए नहीं होती, वह मन, मस्तिष्क और देश की आत्मा को झकझोरने वाली शक्ति भी होती है।
मृत्यु और साहित्यिक विरासत
सोहनलाल द्विवेदी का निधन १ मार्च १९८८ को हुआ, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी राष्ट्र के हर जज्बे में जीवित हैं। उनकी कविता ‘चलो भारत’ आज भी नई पीढ़ी को आवाज देती है कि वे केवल करियर नहीं, राष्ट्र के कर्मयोगी बनें।
सोहनलाल द्विवेदी उन विरले कवियों में हैं, जिनकी लेखनी ने स्वतंत्रता आंदोलन को शब्दों का शस्त्र दिया। वे साहित्यकार नहीं, साहित्य-सेनानी थे। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जब कलम जागती है, तो क्रांति की मशालें जल उठती हैं।
उनकी कविताएं आज भी प्रासंगिक हैं, विशेषकर तब जब राष्ट्र को वैचारिक एकता और प्रेरणा की आवश्यकता होती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, द्विवेदी जी ने कविता को जनक्रांति का माध्यम बनाया।
उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियां
ऊंचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है
नीचे पखार पग तल, नित सिंधु झूमता है,
गंगा पवित्र यमुना, नदियां लहर रही हैं
पल-पल नई छटाएं, पग पग छहर रही हैं।
वह पुण्यभूमि मेरी
वह जन्मभूमि मेरी,
वह स्वर्णभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में
चिड़ियां चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में,
अमराइयां घनी हैं, कोयल पुकारती है
बहती मलय पवन है, तन मन संवारती है।
वह धर्मभूमि मेरी
वह कर्मभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी
जन्में जहां थे रघुपति, जन्मी जहां थीं सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई वंशी पुनीत गीता,
गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया
जग को दया दिखाई, जग को दिया दिखाया।
वह युद्धभूमि मेरी
वह बुद्धभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी!
`तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!’
इस प्रकार की ओजपूर्ण कविता आज भी देशभक्तों की चेतना को ऊर्जा देती है।
