शातिर है दुनिया

शातिर यहां कौन नहीं है,
हर चेहरा एक मुखौटा पहने,
दिल नहीं, दिमाग से रिश्ते बने,
मौके की तलाश में सब हैं खड़े।
जो देता है धोखा जग को,
वो खुद भी चालों में फंसे,
चक्रव्यूह ऐसे बुनते लोग यहां,
दुश्मन भी अपने जैसे ही लगे।
डिजिटल रिश्तों की दौड़ में,
तन्हा ही हैँ अपनों की भीड़ में,
पूछते हैं हाल-चाल सब यहां,
पर दुख में कोई साथ न चले।
चेहरे पर चेहरा लगाने में माहिर,
नाकामियों को छुपाने में होशियार।
झूठ को सच की चादर में लपेटे,
पीछे छुपा इंसान का छल व्यापार।
-मुनीष भाटिया
मोहाली

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