सामना संवाददाता / मुंबई
कोली समाज मुंबई का मूल निवासी है। इसके बावजूद क्रॉफर्ड मार्केट स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज मंडी से मछुआरों को बेदखल करके वह भूखंड एक प्राइवेट डेवलपर को सौंप दिया गया। क्या मछुआरा समुदाय को मुंबई से उजाड़ने की साजिश महायुति सरकार की ओर से रची जा रही है? इस तरह का आक्रोशपूर्ण सवाल विधायक असलम शेख ने कल विधानसभा में उठाया।
विधानसभा में कल विधायक असलम शेख ने कहा कि कोली समाज की मछली मंडियों के परमिट रद्द किए जा रहे हैं। लगभग ५० वर्षों से छत्रपति शिवाजी महाराज मंडी मछली व्यापार का एक मुख्य केंद्र रही है, जहां हर साल करीब २००० करोड़ रुपए का व्यापार होता है। इस मंडी में संपूर्ण कोकण किनारपट्टी, वसई, वर्सोवा, रायगड, रत्नागिरी से लेकर मालवण तक के मछली उत्पादक बिक्री के लिए आते हैं। कोली समाज ने यह भूखंड ४०० करोड़ रुपए में ३० साल के लीज करार पर लेने की इच्छा जताई थी। फिर भी इस भूखंड का आरक्षण रद्द करके उसे प्राइवेट डेवलपर को ३० वर्षों के लिए ३६९ करोड़ में और अगले ३० वर्षों के लिए सिर्फ एक से १००१ रुपए में लीज पर दिए जाने का आरोप मछुआरा संगठनों ने लगाया है। साथ ही उन्होंने सवाल खड़ा किया कि अगर मछुआरा संस्था विकासक से ५० करोड़ रुपए अधिक देकर अपनी मंडी बचाने का प्रयास कर रही है, तो यह भूखंड बिल्डर के हवाले क्यों किया जा रहा है? इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र की समुद्री सीमा में दूसरे राज्यों के ट्रॉलर्स द्वारा की जा रही अवैध मछली पकड़ने का मुद्दा भी उठाया। गश्त करने वाली नौकाएं न होने के कारण मछली पकड़ने की बंदी अवधि में भी दूसरे राज्यों की नौकाएं महाराष्ट्र की समुद्री सीमा में बेतरतीब घुसपैठ कर रही हैं। यह स्थिति यूं ही बनी रही, तो किसानों की तरह मछुआरों को भी आत्महत्या करने की नौबत आ सकती है। इस तरह की चिंता भी उन्होंने जताई।
