लोकमित्र गौतम
भारत में हर महीने एक ‘रेडिट यूजर’ के साझा किए गए आंकड़े (जो कि इंडस वैली रिपोर्ट पर आधारित हैं) के मुताबिक, २५.८ करोड़ लोग विभिन्न प्रकार की ईएमआई किस्तें चुकाते हैं और ये किस्तें चुकानेवाले लगभग एक तिहाई से अधिक परिवार हर महीने अपनी मासिक आय का ३३ फीसदी से ज्यादा ईएमआई चुकाने में खर्च कर देते हैं।
मध्य और निम्न मध्यवर्ग के हिंदुस्थानियों पर बैंकों से लिए गए कर्ज का फंदा इस कदर गहराता जा रहा है कि हमारी सकल घरेलू बचत जो कभी जीडीपी के ३८ फीसदी (२००७-०८) तक हुआ करती थी, इस समय घटकर ५.१ प्रतिशत रह गई है और लोगों पर व्यक्तिगत लोन बढ़कर रुपए ५५.३ ट्रिलियन (रुपए ५५.३ लाख करोड़) हो चुका है। यह आंकड़ा सितंबर २०२४ तक का है। भारत में बैंकों से लोन लेनेवाले लोगों पर कुल जीडीपी के ४३ फीसदी तक घरेलू ऋण हो चुका है। यदि हम वर्तमान जीडीपी जो कि २९० लाख करोड़ रुपए है, पर इसे लागू करें, तो करीब १२५ लाख करोड़ रुपए बनता है। इस तरह भारत में लोगों के ऊपर बैंकों का १२५ लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इसमें व्यक्तिगत ऋण की राशि ५५.३ लाख करोड़ रुपए है। हालांकि, ब्याज सहित कुल भुगतान का आंकड़ा स्पष्ट नहीं है, लेकिन बाजार और बैंकिंग डाटा देखने से पता चलता है कि इस ऋण में व्यक्तिगत, होम, आटो और क्रेडिट कार्ड का हिस्सा २०२३ में लगभग ४२ लाख करोड़ रुपए था और अगर हम एक ताजी ब्याज दर ९ से १६ फीसदी तक मान लें तो आरबीआई के डाटा के मुताबिक, देश में ३४ फीसदी ऋण होम लोन है और २०२४ के आखिर तक लोगों को इस समग्र होम लोन पर १० फीसदी से ज्यादा सालाना दर पर ब्याज चुकाना पड़ रहा था। इससे जो आंकड़ा बनता है, उसके मुताबिक लगभग हर महीने देश के आम लोग ३ से ५ लाख करोड़ रुपए ब्याज चुका रहे हैं और इस ब्याज पर अगर १० फीसदी दर की ही ब्याज राशि मान लें तो हर साल करीब १२.५ लाख करोड़ रुपए या १.०४ लाख करोड़ रुपए हर महीने लोग सिर्फ ब्याज चुका रहे हैं, मूल धन अलग से है।
भयावह हकीकत!
इन आंकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है कि भले किस्से, कहानियों और साहित्य में कर्ज देने वाला विलेन साहूकार होता हो, लेकिन अगर हकीकत में सारी स्थिति को गहराई से समझें तो देश में असली साहूकार बैंक (और उनमें भी सरकारी बैंक) हैं, जो आम लोगों की कमाई को लगातार ब्याज के जरिए चूस रहे हैं। जब हम बिना लोन लिए सरकारी बैंकों के बारे में सोचते हैं और उनकी स्थापना के उद्देश्यों को पढ़ते हैं तो लगता है कि जैसे वो हमारी भलाई के लिए ही बने हैं। उनकी स्थापना का उद्देश्य शानदार, आकर्षक शब्दों में लिखा गया साहित्य होता है, उससे यही अंदाजा लगता है कि सरकारी बैंक तो लोगों की भलाई के लिए ही खोले गए हैं और सरकार का भी कुछ ऐसा ही कहना होता है कि जैसे सरकारी बैंक तो सार्वजनिक हितों व देश को विकास गति देने के लिए कार्यरत हैं। जबकि अगर आम लोगों से उनकी हकीकत पूछें तो ये सरकारी बैंक ही हैं, जो उन्हें २० लाख रुपए का २० सालों के दिए कर्ज के बदले उनसे करीब ४० लाख रुपए वसूलते हैं। बैंक ऋणों से की गई अंधाधुंध कमाई के अलावा अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के एवज में ही लोगों से दिन पर दिन वसूले गए चार्ज को बढ़ाते जा रहे हैं, उससे भी भरपूर कमाई करते हैं और इसके बाद भी साहित्य में, हमारी सोच में और अनुभूतियों में, लोगों को ब्याज में कर्ज देकर खून चूसनेवाला सिर्फ साहूकार होता है। एक ऐसे समय में जब आम लोगों की कमाई बढ़ नहीं रही और जिनकी कुछ बढ़ रही है, वह भी बढ़ती महंगाई दर के बराबर हो गई है। उसी समय हमारे सरकारी बैंक किस तरह साल दर साल ब्याज की मोटी रकम वसूलकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, इसे इस बॉक्स-१ में देख सकते हैं।
सरकारी ढकोसलेबाजी
सवाल है कि आखिरकार सरकारी बैंकों को इतना ज्यादा मुनाफा क्यों चाहिए? जब सरकारी बैंकों का घोषित उद्देश्य देश के लोगों की भलाई करना है, उनको उन्नति करने में सहायता पहुंचाना है तो फिर इस सहायता के बदले में उनसे आखिर इतनी ज्यादा ब्याज की रकम क्यों वसूली जा रही है? सरकारी बैंकों को कमाया गया मुनाफा किसी साहूकार के खाते में तो जमा नहीं करना, उनका तो आखिरकार कमाई का एक बड़ा हिस्सा डिविडेंड के रूप में सरकार के पास जाता है और इससे भी बड़ा हिस्सा खुद उनके पास जमा रहता है। …तो फिर सरकार एक तरफ लोगों की भलाई के बड़े-बड़े दावे करती है और उन्हीं से ब्याज के नाम पर जबर्दस्त कमाई करती है। बैंकों के इस ब्याज फंदे से देश का मध्य और निम्न मध्यवर्ग किस तरह पिस रहा है। इसका शायद सरकार को या बैंकों को अंदाजा नहीं होगा।
हालांकि, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कभी यह नहीं बताया जाता कि देश में कितने लोगों ने कर्ज और ब्याज के फंदे से परेशान होकर आत्महत्या की, मगर यदि किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों से अनुमान लगाएं तो सोच सकते हैं कि हर साल देश में करीब १० हजार से ज्यादा आत्महत्याएं लिए गए कर्ज को चुकाने की असमर्थता की लाचारी के कारण होती है। जब सरकार घोषित तौर पर अपने नागरिकों की भलाई और सुरक्षा के लिए होती है तो फिर उसी सरकार के उपक्रम बैंक लोगों से इतनी ज्यादा कमाई करके किसका पेट भर रहे हैं? वक्त आ गया है कि यह ढकोसलेबाजी खत्म हो कि सरकारी बैंक लोगों के हितरक्षक हैं। ये बैंक भी उसी तरह से मुनाफा कमाते हैं, जैसे कि कोई प्राइवेट बैंक या साहूकार कमाता है। सच बात तो यह है कि सभी बैंक चाहे वो सरकारी हो या गैर सरकारी कर्ज लेने वाले आम लोगों का वैसे ही खून चूसते हैं जैसे साहूकार चूसते हैं।
सार्वजनिक बैंकों की शुद्ध कमाई (करोड़ रुपए में)
बैंक साल २०२४-२५ २०२३-२४ २०२२-२३
भारतीय स्टेट बैंक ७०,९००.६३ ६१,०७७ ५०,२३२
बैंक ऑफ बडौदा १९,५८१.१५ १७,७८८ १४,११०
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया १७,९८७.१४ १३,६४९ ८,४३३
वैâनरा बैंक १७,०२६.६७ १४,५५४ १०,६०४
पंजाब नेशनल बैंक १६,६३०.२० ८,२४५ २,५०७
इंडियन बैंक १०,९१८.२९ ८,०६३ ५,२८२
बैंक ऑफ इंडिया ९,२१९.०२ ६,३१८ ४,०२३
बैंक ऑफ महाराष्ट्र ५,५१९.७९ ४,०५५ २,६०२
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ३,३३४.२७ २,६५६ २,०९९
यूको बैंक २,४४४.९६ १,६५४ १,८६२
पंजाब एंड सिंध बैंक १,०१५.८३ ५८५ १,३१३
योग १,७८,३६३.६५ १,४१,२०३ १,०४,६४९
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)
