हिमांशु राज
पिछले साढ़े चार दशकों से डॉ. मिकी मेहता भारत में संपूर्ण स्वास्थ्य (होलिस्टिक हेल्थ) के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम रहे हैं। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान, प्राकृतिक चिकित्सा और आध्यात्मिक विज्ञान को मिलाकर एक नया तरीका अपनाया है, जिससे शरीर, मन और आत्मा तीनों को संतुलित किया जा सके। वे न केवल भारत के प्रमुख होलिस्टिक हेल्थ गुरु हैं, बल्कि कॉर्पोरेट दुनिया में आध्यात्मिक कोच भी हैं।
डॉ. मेहता कहते हैं, “गंभीर बीमारियों का इलाज प्राचीन परंपराओं और आधुनिक विज्ञान के मिलन से संभव होता है। जब ये दोनों साथ आते हैं, तो जीवन बचाए जा सकते हैं, लंबा किया जा सकता है और कई बीमारियों को नियंत्रित या उलटा भी जा सकता है।”
अपने इलाज के तरीकों के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, “हम मर्म चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, पंचकर्म, रचनात्मक पोषण, कमजोर फेफड़ों को मजबूत बनाना, हृदय को सशक्त करना, शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर करना और विषैले तत्वों को बाहर निकालना जैसे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हम 100% शुद्ध जैविक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं, कभी अकेले तो कभी होम्योपैथी के साथ मिलाकर।”
उनके अनुसार, उपचार सिर्फ शरीर का नहीं होता, बल्कि मन और भावना का भी होता है। वे कहते हैं, “जब मन और दिल में तालमेल होता है, तो अंदरूनी टकराव खत्म हो जाते हैं। यह व्यक्ति को शांति और एकता की ओर ले जाता है।”
वे आगे बताते हैं, “हम मरीज की क्षमता के अनुसार मूवमेंट थेरेपी, पानी में फिजियोथेरेपी, साउंड थेरेपी, राग संगीत, मौन और मंत्रों की चिकित्सा जैसे उपाय करते हैं। ये सभी इलाज व्यक्ति की उम्र, बीमारी, शरीर, माहौल और पेशे के अनुसार अलग-अलग बनाए जाते हैं, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता, ऊर्जा और जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सके।”
डॉ. मेहता का मानना है कि स्वास्थ्य सिर्फ दवाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन और समर्पण से भी जुड़ा होता है। वे कहते हैं, “जब कोई मरीज पूरे समर्पण और नियम के साथ दिनचर्या और ऋतुचर्या का पालन करता है, तब शरीर और मन दोनों सकारात्मक प्रतिक्रिया देने लगते हैं।”
उनका कहना है, “जहां आशा, आस्था और सच्चाई होती है, वहां चमत्कार होते हैं। शरीर की ऊर्जा बदलकर उसमें नई शक्ति आ जाती है। सही संतुलन में प्रकृति के तत्वों का उपयोग करने से रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ती है और जीवन बेहतर बनता है।”
लेकिन हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग इलाज क्यों ज़रूरी है? इस पर वे कहते हैं, “अधिकतर बीमारियां मन से शुरू होती हैं और शरीर में दिखाई देती हैं। गुस्सा, लालच, ईर्ष्या, आलस्य जैसे भाव हमारे भीतर विकार पैदा करते हैं। जब हम मन, शरीर और आत्मा तीनों पर काम करते हैं, तो पुरानी नकारात्मक यादें बदलती हैं और नए तरीके से स्वास्थ्य सुधरने लगता है।”
अंत में वे कहते हैं, “हमारा इलाज पूरी तरह से उस व्यक्ति के शरीर, उम्र, लिंग, बीमारी, पर्यावरण और उसके पेशे के अनुसार तैयार किया जाता है। यही सही इलाज का रास्ता है, जिससे व्यक्ति मृत्यु की ओर नहीं, जीवन की ओर बढ़ता है।”
