मुख्यपृष्ठस्तंभगपशप : ‘लोकतंत्र की लंका-माननीयों के मनगट की मवाली मुठभेड़’

गपशप : ‘लोकतंत्र की लंका-माननीयों के मनगट की मवाली मुठभेड़’

राजन पारकर

महाराष्ट्र का कानूनमंडल अब कानून से उतना ही दूर हो गया है, जितना चंद्र धरती से। एक समय था, जब यहां संविधान की शपथ लेकर चर्चा होती थी, आज वही सदन गली के दादा लोगों के लिए अखाड़ा बन चुका है। अगर इन दो दिन की झड़पों का वीडियो नेटफ्लिक्स पर ‘विधानभवन: द रीयल बिग बॉस’ नाम से डाला जाए तो पाकिस्तान भी टीआरपी में पीछे रह जाएगा।
पिछले दो दिन विधानमंडल ने ‘विधि’ को सीधे गटर में बहा दिया है। जितेंद्र आव्हाड और गोपीचंद पडलकर-दो जनप्रतिनिधि, गाड़ी के मामूली टक्कर पर ऐसे भिड़े जैसे शंकर और भस्मासुर! ‘वाहन से धक्का’ मुद्दा छोड़कर सीधे ‘वाहियात राडा’ मोड में चला गया और उनके समर्थकों ने विधानभवन को रिंग बना दिया।
एक समय था, जब वरिष्ठ विधायक नीति पर बहस करते थे, आज के विधायक गाड़ियों के स्व्रैâच पर गालियों की बारिश कर रहे हैं! वैâमरे के सामने माइक फेंकना, कॉलर पकड़ना, घूरना-यह ‘पॉलिटिकल प्रोफेशन’ नहीं, `गुंडा परफॉर्मेंस’ लगता है। मामला यहीं नहीं रुका। अब यह लड़ाई परिवारों की चौखट तक जा पहुंची है। विरोधी की बेटी, मां और बहन को गालियों से अपमानित करना कौन सी लोकतांत्रिक परंपरा है? रोहित पवार ने आरोप लगाया कि पडलकर के कार्यकर्ताओं ने जितेंद्र आव्हाड की बेटी को गंदी गालियां दीं। आव्हाड की मां-बहन के नाम पर भी अपशब्दों की बौछार की गई। क्या यही जनप्रतिनिधियों की संस्कृति है?
ऋता आव्हाड ने भी ट्विटर के माध्यम से इस गटरगीरी पर जोरदार हमला किया। उन्होंने कहा, `हमने किन लोगों को विधायक बना दिया? ये नेता नहीं, समाज पर धब्बा हैं!’ उन्होंने आगे लिखा कि अगर कल के दंगाइयों को गृह मंत्रालय पकड़ लाए तो उनका नाम इतिहास में ‘स्वर्ण अक्षरों’ में लिखा जाएगा। एक जमाना था, जब विधानभवन में आमदारों के परिवार को भी प्रवेश कठिन होता था, अब वही परिसर गुंडों की परेड ग्राउंड बन गया है। `हाथ में संविधान हो, पर दिमाग में फपंâूदी हो, तो लोकतंत्र सिर पर बैठकर नाचेगा!’
आज वही लोकतंत्र महाराष्ट्र में सिर के बल खड़ा है। पहले जब ‘जनप्रतिनिधि’ कहा जाता था तो याद आते थे, न्या. गोखले, आंबेडकर, जैसे चिंतक। आज याद आते हैं, सीसीटीवी में माइक फेंकने वाले, लॉबी में झगड़ने वाले, ट्विटर पर गाली देने वाले।
जनता से अपील
`अगली बार वोट देने से पहले उम्मीदवार का पदवी प्रमाणपत्र नहीं,उसका ट्विटर अकाउंट, कॉलर की ऊंचाई और सीसीटीवी फुटेज जरूर चेक करें।’
विशेष नोट
`यह व्यंग्य पूरी तरह वास्तविक घटनाओं पर आधारित होते हुए भी, अगर किसी को झटका लगे तो इसका इलाज सदन की नई ‘सदन में शांति योजना’ में नहीं मिलेगा।’

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