मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : पुराने हथियारों से नए युद्ध नहीं जीते जा सकते...!

तरकश : पुराने हथियारों से नए युद्ध नहीं जीते जा सकते…!

नरेंद्र शर्मा

दुश्मनों पर बढ़त हासिल करने के लिए न सिर्फ अति आधुनिक हथियारों से लैस होने की आवश्यकता है, बल्कि देशज रक्षा टेक्नोलॉजी की भी जरूरत है। इस बात पर बल देते हुए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है, ‘आज के युद्ध को आप कल के हथियारों से नहीं जीत सकते। आज के युद्ध आने वाले कल की टेक्नोलॉजी से ही लड़े जा सकते हैं।’ यह बताते हुए कि युद्ध के आधुनिक मैदानों में आउटडेटेड टेक्नोलॉजी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, सीडीएस ने देशज ड्रोन टेक्नोलॉजी के विकास में तेजी लाने और यूएएस ग्रिड्स को काउंटर करने की वकालत की है।
गौरतलब है कि एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने २८ फरवरी २०२५ को कहा था कि भारतीय वायु सेना को हर साल ३५ से ४० फाइटर जेट्स जोड़ने की जरूरत है, ताकि संख्या में कमी को पूरा किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (एचएएल) ने वायदा किया है कि वह अगले साल २४ तेजस मार्क-१ए जेट्स का निर्माण करेगी, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद ३० मई २०२५ को वायु सेना प्रमुख सिंह ने इस तथ्य पर गहरी चिंता व्यक्त की कि कोई भी डिफेंस प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं होता है, निरंतर देरी होती रहती है। एक भी प्रोजेक्ट ऐसा नहीं है, जो वक्त पर पूरा हुआ हो। उन्होंने इस संदर्भ में जवाबदेही निर्धारित करने का आग्रह किया था और यह भी कि रक्षा सामानों की खरीद व निर्माण इकोसिस्टम में तेजी लाई जाए। उन्होंने कहा था, ‘अनेक बार, कॉन्ट्रैक्ट्स पर हस्ताक्षर करते हुए हम जानते हैं कि वह सिस्टम समय पर नहीं आएंगे। मुझे ऐसा एक भी सिस्टम याद नहीं आता, जो समय पर पूरा हुआ हो।’ कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करते वक्त अव्यावहारिक टाइमलाइन का वायदा किया जाता है, इस पर उन्होंने सवाल किया था, ‘हम ऐसा वायदा ही क्यों करते हैं जिसे पूरा नहीं किया जा सकता?’
दोनों, सीडीएस व एयर चीफ मार्शल के बयानों से मालूम होता है कि सेना के तीनों अंगों को न सिर्फ आधुनिक हथियारों से लैस करने की जरूरत है, बल्कि इन हथियारों की डिलिवरी भी समय पर होनी चाहिए। बहरहाल, दिल्ली स्थित मानिकशॉ सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में १६ जुलाई २०२५ को बोलते हुए सीडीएस चौहान ने याद दिलाया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने १० मई २०२५ को अनआर्म्ड ड्रोनों व लोइटर अमुनिशन का इस्तेमाल किया था। लेकिन ‘कोई भी वास्तव में भारतीय सेना या नागरिक इंप्रâास्ट्रक्चर को नुकसान नहीं पहुंचा सका और उनमें से अधिकतर को बेकार कर दिया गया था’। यहां यह बताना आवश्यक है कि भारतीय सेना के लिए अमेरिका से तीन अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर्स की पहली खेप २१ जुलाई २०२५ को आ जाएगी, जो थल सेना की युद्ध क्षमता में वृद्धि करेगी। एएच-६४ई जिन्हें ‘हवा में टैंक’ भी कहा जाता है, उनकी हैवी-ड्यूटी फायर पॉवर की वजह से, २१ जुलाई २०२५ को हिंडन एयर फोर्स स्टेशन पर डिलिवर किए जाएंगे। अनुमान यह है कि शेष तीन हेलिकॉप्टर इस साल के अंत तक डिलिवर कर दिए जाएंगे। इससे पहले २०१५ में अमेरिका सरकार व बोइंग के साथ एक समझौते के तहत भारतीय वायु सेना ने २२ अपाचे खरीदे थे। ये सभी २२ अपाचे जुलाई २०२० तक भारत को मिल गये थे, जिनसे भारतीय वायु सेना के दो स्क्वाड्रन सक्रिय हो चुके हैं।
चिंता का विषय!
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि भारत को अपनी रक्षा व्यवस्था आधुनिक व मजबूत करने की जरूरत है और वह भी बहुत जल्द। दरअसल, सुरक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तानी तस्करों ने अपनी नापाक हरकतें तेज कर दी हैं। वह ड्रग्स, हथियारों व गोला-बारूद से लैस ड्रोनों को भारत में बहुत अंदर तक पहुंचा रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान थोड़े समय के लिए स्थगन के बाद ड्रोन-आधारित तस्करी अधिक सटीकता के साथ फिर आरंभ हो गई है। खबरें ये हैं कि चीनी ड्रोनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो अधिक ऊंचे उड़ते हैं, जिससे अक्सर पकड़ में नहीं आते हैं। इसे मामूली तस्करी नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सुनियोजित पाकिस्तानी आईसीएडी (अवैध, बलपूर्वक, आक्रामक व भ्रामक) स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, भारत की सुरक्षा को भेदने के लिए। उद्देश्य यह है कि सीमा के इस पार जो आपराधिक तत्व हैं, उन तक ड्रग्स, बंदूकें व पैसा पहुंचाया जाए।
यह पाकिस्तान का पुराना तरीका है भारत को नुकसान पहुंचाने का। याद कीजिए कि पिछली सितंबर में पंजाब पुलिस की एक टीम ने नाटो-ग्रेड की बंदूकों का जखीरा बरामद किया था, जो संभवत: अफगानिस्तान से आया था, लेकिन उसका संबंध पाकिस्तान के ड्रोन ड्रॉप तस्करों से था। यह कार्यप्रणाली इस एतबार से भी जाहिर हो जाती है कि ऐसे ही हथियार कश्मीर में आतंकियों के पास से भी मिले थे। जब २०१९ में धारा ३७० को निरस्त किया गया, उसके बाद से ही पाकिस्तान से ड्रोन ड्रॉप्स आरंभ हुए। इसे काउंटर करने के लिए बीएसएफ ने एंटी-ड्रोन सिस्टम्स अपनाए, जैसे ड्रोनाम जो लेजर का इस्तेमाल करके पाक-मूल के यूएवी को नष्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त विशिष्ट एंटी-ड्रोन टीमें भी गठित की गई हैं। लेकिन ड्रोन टेक्नोलॉजी इतनी बहुमुखी है कि वह निरंतर विकसित होती जा रही है इसलिए सीडीएस चौहान कह रहे हैं कि हम अपनी देशज ड्रोन टेक्नोलॉजी को लगातार बेहतर व आधुनिक करते रहें।
विदेशी तकनीक कब तक?
आज ड्रोनों को मॉडिफाई व इस तरह से ढाला जा सकता है कि वह पकड़ में न आएं। वह तरीकेकार बदल सकते हैं और एप्लिकेशन में भी परिवर्तन ला सकते हैं। यूक्रेन युद्ध सबूत है कि हर पखवाड़े में ड्रोन टेक्नोलॉजी बदल रही है। इसका अर्थ यह है कि रियल टाइम में काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी को भी निरंतर बदलना होगा। मतलब यह हुआ कि संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था में महारत का विशाल पूल बनाना होगा और उसे शोध व विकास संस्थाओं से जोड़ना होगा। ड्रोन बहुत तेजी से बदल रहे हैं, एफपीवी से फाइबर ऑप्टिक हुए और अब उनका एआई रूप आता जा रहा है। इन हालात में आगे रहने का एकमात्र तरीका यही है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी में बहुत अधिक निवेश किया जाए, दोनों उद्योग व शोध में। भारत को अपना ही ड्रोन सुरक्षा कवच बनाना चाहिए। सीडीएस इसी जरूरत पर बल दे रहे हैं।
दरअसल, सीडीएस चौहान नहीं चाहते कि भारत विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहे। उनके अनुसार, पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विदेशी टेक्नोलॉजी पर भरोसा किया और नाकाम रहा। भारत का अपनी ही देशज टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए व उसे निरंतर अपग्रेड करते रहना चाहिए, तभी वह भरोसे के लायक रहेगी। ध्यान रहे कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्थानीय तौर पर विकसित किए गए यूएएस व काउंटर-यूएएस प्रयोग किए गए थे, जो भारतीय जरूरतों व भारतीय भूखंड के हिसाब से थे और इसलिए कारगर साबित हुए। सीडीएस के अनुसार, ‘विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता हमारी तैयारी को कमजोर कर देती है, उत्पादन बढ़ाने की हमारी क्षमता को सीमित कर देती है और नतीजतन नाजुक अवसरों पर स्पेयर्स की कमी पड़ जाती है।’
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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